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10
Oct

Rice Thrips राइस थ्राइप्स

1. थ्राइप्स के निम्फ (शिशुकीट) और वयस्क दोनों ही कोमल पत्तियों

के रस पीकर जीते हैं।

2. प्रभावित पौधे के पत्तों के अग्र भाग मुर्झाने लगता है और मुड़ जाता है। पत्तों के इन्हीं मोड़ों में थ्राइप्स रहते हैं।

3. सिक्किम में और त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर एवं अरुणाचल प्रदेश के झूम क्षेत्रों में पाए जाने वाला  यह एक गंभीर नुकसान पहुंचाने वाला कीट है।  

 

10
Oct

Rice Armyworm राइस आर्मीवर्म

1. आर्मी वर्म (Spodoptera mauritia) मेघालय के जोवई जिले के उमरैयांग घाटी, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों घाटी क्षेत्र में चावल की फसल में तेजी से फैलने वाला कीट है।

2. कैटरपिलर पत्ते खाकर जीते हैं और फसल पर इनके गंभीर प्रकोप होने की स्थिति में बिचड़े और मुख्य फसल वाले संपूर्ण खेत नष्ट होकर इस तरह दिखते हैं मानो वे जानवरों के द्वारा चर लिए गए हों।    

3. रात के समय लार्वा बड़ी तेजी से पत्तों को खाते हैं और दिन के समय मिट्टी के छिद्रों और दरारों में छिप जाते हैं। 

 

10
Oct

Rice Caseworm राइस केसवर्म

1. केस वर्म (Nymphula depunctalis) उत्तर पूर्व के बहुत से इलाकों में

पाया जाने वाला गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने वाला कीट है।

2. वयस्क केस वर्म 6 मिमी लंबे होते हैं और इनके डैनों का फैलाव 15 मिमी होता है। हरे रंग के पतले कैटरपिलर 1.25 सेमी लंबे पत्ते के टुकड़े काटते हैं और इनसे नलिकाकार सरंचनाओं का निर्माण करते हैं जिन्हें खाकर वे एक से दूसरे पौधे पर जाते हैं। अधिक क्षति की स्थिति में पत्ते कंकलीय रूप में परिणत हो जाते हैं और उनका रंग सफेद हो जाता है।

 

 

10
Oct

Rice Leaf roller राइस लीफ रोलर

1. लीफरोलर या लीफ फोल्डर (Cnaphalocrocis medinalisi) उच्चभूमि और

 निम्नभूमि चावल की फसलों में पाया जाने वाला सामान्य कीट है।

2. लार्वा पत्र फलक के किनारे को बांधकर उसे मोड़् देता है और उसके अन्दर रहकर मेसोफिल या हरित पदार्थ को खाता रहता है। 

3. लार्वा द्वारा खाए जाने के कारण पत्ती के उत्पादक क्षेत्रफल में कमी आती है और इससे पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। फसल में इसका अधिक प्रकोप होने से पौधों में सफेद धब्बे के साथ खेत का रुग्ण दिखाई पड़ता है। 

4. यदि इसका प्रकोप बूट लीफ अवस्था तक हो तो इस कारण फसल को भारी नुकसान पहुंचता है। मॉथ का रंग भूरा-नारंगी होता है जिसमें गहरे रंग के दो और एक सुस्पष्ट लहरदार धारियां भूरे रंग के अगले और पिछले डैनों पर दिखाई पड़ते हैं।  

5. पत्ते की निचली सतह पर अंडे एक-एक की संख्या में अलग-अलग रहते हैं।

6. जीवन चक्र कुल 25-40 दिनों का होता है। धान की

10
Oct

Rice stem borer राइस स्टेम बोरर

1. स्टेम बोरर  (Scirpophaga incertulus) चावल का एक प्रमुख कीट है

और यह इस सारे क्षेत्र में पाया जाता है। मादा मॉथ के अगले डैने चमकीले पीले रंग के होते हैं और प्रत्येक पर एक काला धब्बा होता है। साथ ही पीले बालों वाले एनल टफ्ट भी पाया जाता है।

2. नर कीट के अगले डैने पर काले धब्बे नहीं पाए जाते। अंडे पत्तियों की छोर पर दिए जाते हैं जो पांडु रंग के रोम से ढके होते हैं। प्रत्येक अंडे के ढेर में 20-25 अंडे होते हैं और मादा ऐसे 3-4 अंडों के ढेर उत्पन्न करते हैं।

3. अंडे सेने की अवधि 6-8 दिनों की होती है और नया विकसित लार्वा पत्रावरण में प्रवेश कर जाते हैं। वहां से वे पौधे के नोडल क्षेत्र के निकट छेद कर अन्दर प्रवेश कर जाते हैं। 30-40 दिनों में लार्वा पूर्ण विकसित हो जाते हैं और इनकी अंतिम लंबाई 2 सेमी तक होती है।

4. प्यूपा गहरे भूरे रंग के होते हैं और यह अवस्था 6-10 दिनों की होती है।

5. लार्वा तने के

इस क्षेत्र में चावल की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण (हानिकारक) कीट:  

1.  स्टेम बोरर 

2.  लीफरोलर

3.  केसवर्म 

4.  आर्मीवर्म

5.  थ्राइप्स

6.  गॉल मिज 

7.  राइस हिस्पा

8.  राइस ईयर कटिंग कैटरपिलर

9.  राइस ग्रीन सेमी लूपर

10. गन्धी बग

11. रूट ऐफिड्स

12. हॉर्न्ड कैटरपिलर

13. स्किपर

14. स्लग कैटरपिलर

 

1. जीव-जंतुओं की जितनी भी प्रजातियां हैं उनमें दो तिहाई कीट होते हैं। वे प्रायः सभी प्रकार वातावरण में पाए जाते हैं। यदि जलवायविक दशाएं अनुकूल हों तो वे अपनी संख्या बड़ी तेजी से बढ़ाते हैं। 

2. भारत के उत्तरपूर्वी प्रदेशों में कीट बांकी सभी जंतुओं की तुलना में बहुतायत से और विविधता में पाए जाते हैं। उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों में 6000 से भी अधिक प्रजातियों के कीट एकत्र किए किए गए हैं और विभिन्न फसलों में 1000 से भी अधिक की पहचान की गई है (Shylesha et ai, 2006)। 12 से भी अधिक संख्या में ऐसे महत्वपूर्ण कीट हैं जो चावल की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। स्टेम बोरर, गन्धी बग, लीफ एंड प्लांट होपर और हिस्पा जैसे कीट उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों में चावल की फसल में लगते हैं।   

 

 

10
Oct

राइस येलो ड्वार्फ

1. बौनापन और प्रोफ्यूज्ड टिलरिंग के साथ सामान्य क्लोरोसिस

के द्वारा इस रोग को पहचाना जा सकता है। क्लोरोटिक पत्ते सकसमान रूप से हल्के पीले रंग के हो जाते हैं। वयस्क संक्रमित पौधों में प्राय: कल्ले नहीं निकलते अथवा नगण्य कल्ले बिना दानों के निकलते हैं। वृद्धि के बाद की अवस्थाओं में संक्रमित पौधों में कटाई से पहले कोई लक्षण नहीं भी दिखाई पड़ सकते हैं। 

2. यह रोग phytoplasmas के कारण होता है और सामान्य तौर पर येलो ड्वार्फ से संक्रमित चावल के पौधों के फ्लोएम ट्यूब में देखा गया है। ये प्लियोमॉर्फिक पिंड होते हैं जिसकी माप 80-800 मिमी होती है, कोशिका भित्ती नहीं होती और इकाई झिल्ली से घिरी होती है। 

3. यह रोग लीफहोपर, Nephotettix virescens द्वारा फैलता है। कीटों में रोगग्रस्त पौधों को आधे घंटे तक खाने से रोगाणु लग जाते हैं और फाइटोप्लाज़्मा फैलाने के लिए अंडे सेने की अवधि लंबी (20 दिनो

10
Oct

राइस टुंग्रो वाइरस (Rice tungro virus)

1. यह रोग 1969 और 1970 के दौरान उत्तर-पूर्व के राज्यों में महामारी

के रूप में पाया गया है। यह सबसे हानिकारक रोगों में से एक है। टुंग्रो से पौधे की वृद्धि रुक जाती है और पत्ते का रंग पीले से लेकर नारंगी रंग के अनेक शेड का होता है। बदरंगता और जंग जैसे धब्बे पत्ते के ऊपरी भाग से नीचे की ओर फैलता जाता है। 

2. युवा पत्ते भी चित्तीदार दिखाई पड़ते हैं और हल्के मुड़े होते हैं जबकि, पुराने पत्ते जंग जैसे रंग के हो जाते हैं।  

3. टुंग्रो दो वायरस – सिंगल स्ट्रैंडेड  RNA  वायरस, राइस टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) के संक्रमण के कारण होता है और टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) और डबल स्ट्रैंडेड  DNA वायरस राइस टुंग्रो बैसिलीफॉर्म बैंड वायरस (RTBV), दोनों वायरस अर्ध-सतत तरीके से अनेकों लीफहोपर्स प्रजातियों, खासकर Nephotettix virescens द्वारा प्रसारित होता है। 

4. संक्रमित पौधे को 30 मिनट तक खाने से की

10
Oct

बैक्ट्रियल लीफ स्ट्रीक

1. यह एक बैक्ट्रियल फोलियर रोग है। यह रोग 1-10 सेमी लंबी जल

से फूला हुआ और पारभाषी इंटरवेनियल धारियों के रूप में सबसे पहले पत्तों से आरंभ होता है। ये शिराओं के समांतर फैलते हैं और पीले-भूरे रंग में बदल जाते हैं जो आगे एक होकर बड़े जख्म के धब्बे बन जाते हैं और पत्तों के संपूर्ण सतह पर फैल जाते हैं। 

यह रोग Xanthomonas campestris pv. Oryzicola नामक सूक्ष्मजीवी के कारण होता है। 

बैक्ट्रियम छड़ की आकृति का होता है, 1.0-2.5 x 0.5-0.8 के आकार में पाया जाता है और एकल ध्रुवीय कशाभ द्वारा मोटाइल होता है।  

 

इस रोग को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं: 

1. ये रोग बीज जनित होते हैं इसलिए बीजों की खरीदी आधिकारिक स्रोत से ही करें।  

2.0.025% Streptocycline में बीजों को भिगोएं और 52° सेल्सियस पर 30 मिनट तक गर्म जल से उपचार करें। 

3. प्रतिरोधी प्रजातियों के खेती करें।  

 

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