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10
Oct

पत्ते का जलने का दाग

1. उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों में फसल के वयस्क अवस्था में यह रोग

पाया जाता है। पत्ते के ऊपरी भाग पर इसका प्रारूपी लक्षण प्रकट होता है। क्षति शीर्ष अथवा किनारे से आरंभ होती है और गहरे भूरे अथवा हल्के पीले क्षेत्रों के रूप में दीर्घाकार हो जाती है। 

2. यह रोग Rhynchosporium oryzae के कारण होता है। रोगानु से कोनीडिया का निर्माण होता है जो hyaline, 2-सेलों वाला और शीर्ष सेल पर असमान लघु पार्ष्व चोंच होता है। 

रोग का प्रबन्धन निम्नलिखित उपायों द्वारा किया जा सकता है-  

 पोटाश की ऊंची मात्रा का प्रयोग कर (80 kg ~O/हेक्टेयर) 

 प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती कर  

 रोग दिखाई पड़ने के बाद 15 दिनों के अंतराल पर 0.1 % Carbendazim और 0.1 % Thiophanate-methyl का 3 बार छिड़काव करने से प्रबन्धन में मदद मिलती है। 

 

 

1. चूंकि रोग बीजजनित है, इसके Thiram @ 2 ग्रा/किग्रा के साथ की उपचार करने से प्रभावकारी नियंत्रण प्राप्त होता है।  

2. नाइट्रोजन के तीन अलग-अलग प्रयोगों और मिट्टी में पोषक-तत्वों की कमी को पोटाश, मैंगनीज़ और जिंक द्वारा पूरा करने से नियंत्रण में पदद मिलती है।  

3. चूना डाला कर मिट्टी की अम्लीयता को खत्म कर रोग को कम किया जा सकता है।

4. HYVs का इस्तेमाल रोग के लिए प्रतिरोधी होता है। 

5. 0.1 % Hinosan 50 EC या 0.2% Dithane M-45 (75 WP) को 0.1 % Sandovit में मिलाकर छिड़काव करने से रोग नियंत्रण में मदद मिलती है।  

 

1. इस रोग के कारण नर्सरी में बिचड़े कुम्हला जाते हैं और

खेतों में पत्ते मुरझा जाते हैं। 

2. धब्बे गहरे भूरे रंग का और अंडाकार होता है; गंभीर मामलों में वे साथ मिलकर बड़ी सी पट्टी बना डालते हैं। यह रोग प्राय: त्रुटिपूर्ण और खराब मिट्टी में पाया जाता है और इसे प्राय: ‘गरीब आदमी का रोग’ कहा जाता है।          

3. संक्रमण ग्लूम्स, पुष्प-गुच्च के गले के भाग पर, और दानों पर बदरंग रूप में देखा गया है। यह रोग प्राय: मेघालय, त्रिपुरा खासकर बोरो सीज़न में पाया जाता है। 

4. यह रोग Helminthosporium oryzae (Bipolaris oryzae) के कारण होता है। फंगस के कारण कोनिडियोफोरस का निर्माण होता है जो लंबा, सिपेट और सिम्पोडियल विन्यास में एकल रूप से कोनीडिया धारण किए हुए होता है। 

5. कोनीडिया भूरे रंग का होता है, 8-10 सेलों वाला, मध्य में थोड़ा मुड़ा रह रहता है और अंत सिरे की ओर तंग होता है।  

जाड़े के मौस

1. विनाशकारी खर-पतवार खेत के मेढ़ों/ऊपरी स्तर पर मौजूद रहते हैं।  

2. निम्न रोग प्रबलता वाले उच्च पैदावार के लिए ऊर्वरक NPK @ 60:60:40 का प्रयोग करें और तीन अलग-अलग खुराकों में नाइट्रोजन का इस्तेमाल करें। i) बुआई के एक सप्ताह बाद, ii) कल्ले निकलने के समय और iii) फूल निकलने के समय।  

3. बुआई की तिथियों को व्यवस्थित करें। अगात (अप्रैल – मई) बुआई वाली फसलों में पछात (जून – जुलाई) बुआई वाली सफलों की तुलना में ब्लास्ट डैमेज कम से कम होता है।  

4. सहनशील/प्रतिरोधी प्रजातियों को उपजाकर रोगों के प्रभाव को कम कर उपज बढ़ाई जा सकती है। सीधी बुआई वाले फसलों के लिए अथवा नर्सरी में बुआई से पहले 0.1% carbendazim के घोल में 24 घंटे तक बीजों को भिंगोएं।    

5. बुचड़े की जड़ों को 12-16 घंटे तक  carbendazim @ 1 gllit के घोल में डुबो कर रखने पर प्रतिरोपित पौधे रोपण के बाद 30-50 दिनों तक सुरक्षित रहते हैं। 

6.(Triton or Sandivit @ 0.1 %)

07
Oct

राइस ब्लास्ट

1. सभी उत्तर-पूवी राज्यों में चावल की यह बहुत ही महत्वपूर्ण और

विनाशक रोग है जिसके कारण उपज में 35-50% की हानि होती है।  

2. पौधे की वृद्धि के सभी चरणों में इसके ऊपरी भाग पर फंगस, पायरीक्युलेरिया ग्रीसिया का हमला होता है हालांकि, आमतौर पर पत्तों, गांठों और पुष्प-गुच्छ के गले पर इसका प्रभाव देखा जाता है। 

3. तंतु आकार के धब्बे पत्ते के मध्य में और भूरे रंग की धारियां प्रमुख लक्षण हैं।    

4. बहुत से सघन धब्बों के कारण पत्ते पर बड़े अनियमित नेक्रॉटिक चित्ती बन जाते हैं और गंभीर मामलों में प्रभावित क्षेत्र में blastedlbumt प्रदर्शित होता है। इसलिए इस रोग का नाम ब्लास्ट रखा गया है।           

5. पत्ते के आवरण पर, काम, काम नोड और उदासी गहरे भूरे अथवा काले रंग की बदरंगता के रूप में दिखाई पड़ता है।  

6. फूल निकलने के समय, पुष्प-गुच्च के गले का भाग संक्रमित हो जाता है जो

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