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10
Oct

राइस येलो ड्वार्फ

1. बौनापन और प्रोफ्यूज्ड टिलरिंग के साथ सामान्य क्लोरोसिस

के द्वारा इस रोग को पहचाना जा सकता है। क्लोरोटिक पत्ते सकसमान रूप से हल्के पीले रंग के हो जाते हैं। वयस्क संक्रमित पौधों में प्राय: कल्ले नहीं निकलते अथवा नगण्य कल्ले बिना दानों के निकलते हैं। वृद्धि के बाद की अवस्थाओं में संक्रमित पौधों में कटाई से पहले कोई लक्षण नहीं भी दिखाई पड़ सकते हैं। 

2. यह रोग phytoplasmas के कारण होता है और सामान्य तौर पर येलो ड्वार्फ से संक्रमित चावल के पौधों के फ्लोएम ट्यूब में देखा गया है। ये प्लियोमॉर्फिक पिंड होते हैं जिसकी माप 80-800 मिमी होती है, कोशिका भित्ती नहीं होती और इकाई झिल्ली से घिरी होती है। 

3. यह रोग लीफहोपर, Nephotettix virescens द्वारा फैलता है। कीटों में रोगग्रस्त पौधों को आधे घंटे तक खाने से रोगाणु लग जाते हैं और फाइटोप्लाज़्मा फैलाने के लिए अंडे सेने की अवधि लंबी (20 दिनो

10
Oct

राइस टुंग्रो वाइरस (Rice tungro virus)

1. यह रोग 1969 और 1970 के दौरान उत्तर-पूर्व के राज्यों में महामारी

के रूप में पाया गया है। यह सबसे हानिकारक रोगों में से एक है। टुंग्रो से पौधे की वृद्धि रुक जाती है और पत्ते का रंग पीले से लेकर नारंगी रंग के अनेक शेड का होता है। बदरंगता और जंग जैसे धब्बे पत्ते के ऊपरी भाग से नीचे की ओर फैलता जाता है। 

2. युवा पत्ते भी चित्तीदार दिखाई पड़ते हैं और हल्के मुड़े होते हैं जबकि, पुराने पत्ते जंग जैसे रंग के हो जाते हैं।  

3. टुंग्रो दो वायरस – सिंगल स्ट्रैंडेड  RNA  वायरस, राइस टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) के संक्रमण के कारण होता है और टुंग्रो स्फेरिकल वायरस (RTSV) और डबल स्ट्रैंडेड  DNA वायरस राइस टुंग्रो बैसिलीफॉर्म बैंड वायरस (RTBV), दोनों वायरस अर्ध-सतत तरीके से अनेकों लीफहोपर्स प्रजातियों, खासकर Nephotettix virescens द्वारा प्रसारित होता है। 

4. संक्रमित पौधे को 30 मिनट तक खाने से की

10
Oct

बैक्ट्रियल लीफ स्ट्रीक

1. यह एक बैक्ट्रियल फोलियर रोग है। यह रोग 1-10 सेमी लंबी जल

से फूला हुआ और पारभाषी इंटरवेनियल धारियों के रूप में सबसे पहले पत्तों से आरंभ होता है। ये शिराओं के समांतर फैलते हैं और पीले-भूरे रंग में बदल जाते हैं जो आगे एक होकर बड़े जख्म के धब्बे बन जाते हैं और पत्तों के संपूर्ण सतह पर फैल जाते हैं। 

यह रोग Xanthomonas campestris pv. Oryzicola नामक सूक्ष्मजीवी के कारण होता है। 

बैक्ट्रियम छड़ की आकृति का होता है, 1.0-2.5 x 0.5-0.8 के आकार में पाया जाता है और एकल ध्रुवीय कशाभ द्वारा मोटाइल होता है।  

 

इस रोग को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं: 

1. ये रोग बीज जनित होते हैं इसलिए बीजों की खरीदी आधिकारिक स्रोत से ही करें।  

2.0.025% Streptocycline में बीजों को भिगोएं और 52° सेल्सियस पर 30 मिनट तक गर्म जल से उपचार करें। 

3. प्रतिरोधी प्रजातियों के खेती करें।  

 

1. कॉपर फंगीसाइड (Blitox 0.3%) से बारी-बारी Streptocycycline (250 ppm) के साथ छिड़काव करें। 

2. नाइट्रोजन ऊर्वरक का हल्का (80  kg/ha) इस्तेमाल और पौधों की दूर-दूर (30 x 15 cm) रोपाई करें।

3. रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती करें। 

 

 

10
Oct

अनाजों पर धब्बे

1. चावल के दानों पर धब्बा, ऊंची भूमि और नीची भूमि दोनों की कुछ प्रजातियों में एक प्रमुख समस्या है। यह अंकुरण को कम करता है, जिससे बिचड़ों का क्षय होता है, तुषमय अनाज होते हैं और अनाज अखाद्य हो जाते हैं।  

2. खराबी एक दानें तक भी सीमित रह सकती है, लेकिन गंभीर मामलों में लगभग संपूर्ण पुष्प-गुच्छ के साथ-साथ प्राक्ष भी बदरंग हो जाते हैं। 

3.Drechslera oryzae, Fusarium sp., Nigrospora oryzae, Penicillium sp., Curvularia sp., Sarocladium oryzae और Rhizophus sp. बदरंग अनाजों से संबंधित हैं। नाइट्रोजान के अत्यधिक इस्तेमाल से अनाज के बदरंग होने की संभावना बढ़ जाती है।  

निम्नलिखित उपायों द्वारा अनाजों को बदरंग होने से रोका जा सकता है:- 

 पुष्प-गुच्छ निकलने के समय 0.1 % Carbendism का छिड़काव,  

 साफ-सुथरी जुताई,

 प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती।

                     

 

 

10
Oct

बंट (कृष्णिका)

1. इस रोग में, बाले के कुछ दानें प्रभावित होते हैं, संक्रमण आंशिक अथवा पूर्ण रूप से हो सकता है। इसका पहला लक्षण फसल पकने के समय ग्लूम से होकर काली धारियों के रूप  में दिखाई पड़ता है। 

2. संक्रमित दानों को चुटकी से मसलने पर बीजाणु के काले पाउडर बाहर निकलते हैं। इस रोग का कारण Tilletia barclayana नामक जीवाणु है।  

3. दानों के अन्दर भरे बीजाणु में बढ़ता है, जो गोलाकार काले रंग का होता और साथ ही कंटीला एपिस्पोर होता है। बीजाणु से स्पोरैडिक का जन्म होता है। ये द्वितीयक स्पोरैडिक को भारी मात्रा में जन्म देते हैं।  

4. टेलियोस्पोर्स मिट्टी अथवा बीजों में जीवित रहते हैं और अगले मौसम तक जीवनक्षम रहते हैं। नाइट्रोजन के अत्यधिक प्रयोग से पौधे इस रोग के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। 

5. अगात प्रजातियां में पछात प्रजातियों की तुलना में अधिक प्रभावित होती हैं। ऊष्ण तापमान  (20-30

1. यह भी के मामूले रोग है और भूरे से लेकर काले रंग के रेखीय धब्बे पत्तों

पर दिखाई देते हैं। धब्बे पत्ते के आवरण, ग्लूम, और तने के भागों पर दिखाई दे सकते हैं। 

2. यह रोग Cercospora oryzae के कारण होता है। रोगाणु कोनीडिया का निर्माण करता है जो  hyaline या काले, फिलिफॉर्म और अनेक कोशिकाओं वाला होता है।  

3. संक्रमित पौधे का कचरा इस रोग का प्राथमिक स्रोत है और पत्ते पर निर्मित कोनीडिया वायु द्वारा फैलकर संक्रमण फैलाता है।  

नियंत्रण: 

 संक्रमित पौधे के केचरे को उसी समय नष्ट कर देना चहिए।  

 0.2% Dithane M-4S का छिड़काव करना चाहिए।  

 

10
Oct

लीफ स्मट

1. यह एक मामूली रोग है और यह पत्तों पर छोटे-छोटे, कज्जलकारी,

धुंधला, भद्दे पट्टियों के रूप में दिखाई पड़ता है जो सोरी (sori) को दर्शाता है। आसानी से प्रभावित होने वाली प्रजातियों में, फंगस पुराने पत्तों के लगभग संपूर्ण भाग पर फैले होते हैं। 

2. इस रोग का कारण Entyloma oryzae है, जो tel iospores को जन्म देता है और कोणीय आकृति से लेकर गोलियों की आकृति वाला, चिकने परत वाला, हल्के भूरे रंग का होता है। 

3. यह रोग संक्रमित पौधों के कचरे में पल रहे सोरी (sori) के कारण फैलता है।  

4. बीजाणु मिट्टी के स्तर के निकट पत्तों पर पहुंचकर इसे संक्रमित करता है। नाइट्रोजन की ऊंची मात्रा के कारण इसकी संभावना बढ़ जाती है। 

नियंत्रण के उपाय : 

•साफ-सुथरी जुताई 

•प्रतिरोधी प्रजातियों की खेती 

 

10
Oct

स्टैक बर्न

1. रोग के लक्षण अंकुर, वयस्क पौधों के पत्तों, और दानों पर वृत्तीय से लेकर दीर्घाकार गहरे भूरे धब्बे के रूप में प्रकट होते हैं जो बाद आगे चलकर आपस में मिलकर बड़े धब्बे बन जाते हैं। गंभीर मामलों में, बिचड़े मुरझा जाते हैं और पत्तों पर छोटे-छोटे काले धब्बे उभर आते हैं जो गोलाकार फंगस के पिंड के रूप में होते हैं। अनाजों पर, हल्के भूरे से लेकर गेहूं रंग के जख्म दिखाई पड़ते हैं जो गहरे काले किनारों से घिरे होते हैं और दाने रंगहीन हो जाते हैं।  

2. इस रोग का कारण Alternaria padwickii नामक जीव है। कोनीडिया लंबवत रूप से फैल जाता है, इसके शीर्ष पर एक लंबा चोंच होता है, 3-S सेप्टेट, क्रीम पीले रंग का, मोटा, सीधा लेकिन सेप्टा पर संकीर्ण होता है। फंगस गोलाकार काला स्क्लेरोशिया भी उत्पन्न करता है। 

3. यह रोग बीजों से होकर प्रसारित होता है जिसके कारण नर्सरी के बिचड़े में प्राथमिक संक्रमण होता

10
Oct

False smut

1. इस रोग की मौजूदगी के बारे में यह मत है कि यह अच्छे साल

को दर्शाता है क्योंकि अनुकूल मौसम में ही इसका विकास होता है और उपज भी बेहतर होता है। यह रोग दानों पर प्रकट होता है और एक अंडाशय बड़े मखमली हरे ढ़ेर से स्क्लेरोशियल पिंड में तब्दील हो जाता है। चूंकि यह स्मट सोरी जैसा दीखता है, इसलिए इसका नाम फाल्स स्मट रखा गया है। बाली में कुछ दाने ही संक्रमित होते हैं।  

2. यह रोग Ustilaginoidea virens, कारण उत्पन्न होता है, जो रफ ओलिव ग्रीन, दानों के छिद्र के रूप में पाया जाता है। कुछ स्पोर बॉल स्क्लेरोशिया में उत्पन्न होते हैं। फंगस कुछ  asci  के साथ perithecium का निर्माण करता है। ऐस्कॉस्पोरस hyaline, पूर्ण भरा हुआ और एकल कोशिकीय होता है।  

3. जाड़े के दौरान फंगस जंगली चावल और विभिन्न घासों पर रहते हैं। प्राथमिक संक्रमण वायुजनित ऐस्कॉस्पोरस होता है और द्वितीयक संक्रमण कैल्मिडोस्पोर्स के द्

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