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10
Oct

शरद चावल (सली) की पद्धतियां

प्रजातियों का चयन: 

A.  प्रतिरोपित सामान्य सली की प्रजातियां:

i) सेमी ड्वार्फ: IR-36U, जया, पंकज, लक्ष्मी, बहादुर, पियोली, कुशाल, मोनिरम, रणजीत ,Kmj 10-2-2, TTB 101-15

ii) ग्लुटिनस : रंगाली, भगाली, अघोनी, Kmj 3-144,Kmj 2-9-2

iii) बहु फ़सलन: सत्य, वसुंधरा,

iv) लंबा: मोनोहर सली, महसुरी, स्वर्णप्रोवा 

v) सुगंधित चावल: केतकी जाहा

B.  बाढ़ के बाद प्रतिरोपित होने वाली प्रजातियां (देर से उगने वाला सली) : मनोहर सली, बिरज, ऐंड्रेसासली,सोपोना, प्रसाद भोग, गोविंदबाभोग, Kmj-1-19-1

C. प्रत्यक्ष बीज से रोपित विलंबित सली : सोनामुखी, लुइट, कपिली, दिशांग 

N.B : i) IR 50 की अनुशंसा दोहरी फ़सल वाली मध्यम भूमि के चावल वाले इलाके के लिए की जाता है, जहां जया को अहू के रूप में उपजाया जाता है, जैसे कि बरक वैली ज़ोन। ii) 130 सेमी से अधिक की ऊंचाई वाली प्रजातियों को लंबी प्रजातियां माना जाता है। प्रतिकूल वर्षा पूरित निम्न भूमि के लिए अ

चावल तथा चावल आधारित फ़सल प्रणालियां 

प्रमुख फ़सल क्रमों के बीच, पतझड़ चावल, शरद चावल-सरसों, शरद चावल-गेहूं/सरसों/दाल, जूट-शरद चावल-सब्जियां तथा पतझड़ चावल-शरद चावल चावल आधारित उत्पादन प्रणाली का प्रमुख क्रम है। 

 

 

10
Oct

पारितंत्र

चावल विविध प्रकार के पारितंत्र में उगाया जाता है, जैसे: 

• वर्षा पूरित/सिंचित उच्च भूमि 

• निम्न भूमि 

• बाढ़ मुक्त तथा 

• बाढ़ प्रवण 

• मध्यम भूमि 

• गहरे जल वाली भूमि  

• पहाड़ी पारितंत्र 

 

10
Oct

असम की मिट्टी

1. असम की मिट्टी को अवशिष्ट या परिवहित सामग्रियों से उत्पन्न माना जाता है। अवशिष्ट सामग्रियां आर्कीन युग के चट्टानों से निर्मित हैं, जिनमें मुख्य रूप से कई निस, शिस्ट्स तथा ग्रेनाइट मौजूद होते हैं। 

2. परिवहित प्रकार की मिट्टी में हिमालय तथा असम की बहती नदी से लाई हुई सामग्रियां शामिल होती हैं। कई क्षेत्रों में इनका  pH रेंज अम्लीय से काफी अम्लीय होता है। निम्न  pH  अवस्था अत्यधिक बारिश के कारण मिट्टी के निक्षालन के कारण उत्पन्न होती है।    

3. मिट्टी के पहचान किए गए मुख्य वर्ग हैं: अद्यतन रिवराइन, ओल्ड रिवराइन, ऑल्ड माउंटेन, नन-लैटराइज़्ड, लैटराइज़्ड। 

 

 

 

10
Oct

असम की ऋतुएं

असम की विभिन्न ऋतुएं निम्न हैं: 

1. मॉनसून पूर्व (मार्च-मई)

2. मॉनसून (जून-सितम्बर)

3. मॉनसून पश्चात- (अक्टूबर-नवम्बर)

4. शरद (दिसम्बर-फरवरी)

 

 

10
Oct

बोरो चावल उगाने की विधियां

a.प्रजातियां/हाइब्रिड: बोरो 1, बोरो 2, कल्चर 1, महसूरी, IR 50, बिष्णुप्रसाद, ज्योतिप्रसाद, जयमोती

b.प्रबंधन: 

बुआई का समय – नवम्बर /दिसम्बर;  रोपण का समय– दिसम्बर /जनवरी

भूमि: नीचे भूमि वाले आदर्श बोरो क्षेत्र या सिंचित क्षेत्र। 

बीज चयन : बीजों को सादा पानी में डालकर डूब जाने वाले स्वस्थ्य बीजों को अलग कर लेते हैं। 

बीज उपचार : सली की तरह ही। 

बीज बेड : चौरस बीज क्यारी (125cm चौड़ी, 10m लंबी तथा दो क्यारियों के बीच 30cm अंतराल वाली) 

बीज दर : 40-45 kg/ha

बिचड़े की आयु : 5-6 पत्तियों वाली अवस्था

खेत की तैयारी : 3-4 जुताई के बाद लेवलिंग। 

अंतराल: 20cmx20cm

उर्वरक N:P:K  = 60:30:30 kg/ha.

जल प्रबंधन: प्रतिरोपण के 2-3 दिनों के बाद, 2 cm सिंचाई जल का इस्तेमाल ठहरे पनी के खत्म होने के 3 दिन बाद करना चाहिए। रुक-रुक कर होने वाली इस प्रकार की सींचाई का फ़सल कटाई से 7-10 पहले प्रयोग करना चाहिए। 

10
Oct

अहू चावल उगाने की विधियां

a.प्रजातियां /हाइब्रिड 

b.I) सेमीड्वार्फ: गोविंद, IR 50, IR 36, लुइट, कोपिली, डिसांग, लैचिट, चिलाराइ, जया

II) लंबा: रोंगाडोरिया, बंगलामी, दुबईचेंगा, फापोरी, गुनी, इहाजित इत्यादि। 

बीज चयन: बोरो चावल की तरह। 

बीज उपचार: बोरो चावल की तरह ही। 

बीज की क्यारी: बोरो चावल की तरह ही। 

खाद /क्यारी में उर्वरक का इस्तेमाल: प्रत्येक क्यारी में 20-30 kg गोबर का खाद या कम्पोस्ट, 80 g यूरिया, 80 g SSP, 40 g MOP की इस्तेमाल करना चाहिए। 

बीज दर : 40-45 kg/ha.

बीज क्यारी में बिचड़ों की सुरक्षा: ब्लास्ट के लिए बैविस्टिन @ 1 g/L जल में इस्तेमाल करना चाहिए; नॉट नेमाटोड तथा स्टेम बोरर के लिए फ्युरॉडन 3 G दानों @ 3 g/m2 का इस्तेमाल करना चाहिए। 

खेत की तैयारी: 3-4 जुताई के बाद सीढी निर्माण।  

उर्वरक: सेमी ड्वार्फ प्रजातियां; N:P2O5:K2O = 40:20:20 kg/ha.

लंबी प्रजातियां: N:P2O5:K2O = 20:10:10 kg/ha.

अंतराल: कतारों के बीच 15-20cm, टीलों के बीच 10-15 cm का

1. राइस ईयर-कटिंग कैटरपिलर को असम और मणिपुर(Pathak et aI., 2001), अरुणाचल, मेघालय और त्रिपुरा में 1982 में पाया गया था(Barwal, 1983)।

2. 1977 में काले रोएं वाले कैटरपिलर का प्रकोप मेघालय में देखा गया था( Sachan और Gangwar, 1979)। राइस हिस्पा का प्रकोप मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में 1987 में देखा गया (Pathak, 1987)। 

3. 1986 से 1990  के बीच शील्ड बग की दो प्रजातियों (Eusarocoris gultieger Jhunl. and Nezara viridula L.) ने मणिपुर मे चावल की फसल को दाने में तरल दूध और दूध के ठोस होने की अवस्था में प्रभावित किया (pathak et aI., 2001)।

4. धान के स्टेम बोरर की पांच प्रजातियों में सिसैमिया इनफरेंस वाक और चिलो पॉलिक्राइसस वाक का भी प्रकोप घाटी में अल्प पैमाने पर हुआ। स्टेम बोरर इस क्षेत्र का स्थाई कीट है, लेकिन मेघालय में यह कभी-कभी ही पाया जाता है। 

5. प्लांट होपर्स में सफेद पृष्ठ वाला प्लांट होपर मणिपुर में गर्मी की शुरुआत में एक बड़ी समस्या सबित हुआ (Barwal और Rao, 1986)।

6.Meinodas

1. स्लग कैटरपिलर (Parasa lepida) चावल की फसल में कभी-कभी लगने वाला कीट है। लार्वा पत्तों को खाता है और केवल पत्ते के मध्य सिरा ही शेष बच पाता है।

2. इसे पहली बार उत्तर-पूर्व के राज्यों में बरसात के दिनों में धान की फसल को आक्रांत करते देखा गया था (Shylesha et al., 2006)।

3. आर्थिक रूप से कम नुकसान पहुंचाने वाले अन्य कीट हैं- फ्ली बीटल ( Chaetocnema basalis and Monolepta signata ), स्टेमफ्लाई, मोल और खेत के झींगुर, ब्लैक बग, स्टिंक बग, ब्लू बीटल और काले ऐफिड।

 

 

 

10
Oct

Rice Skipper राइस स्किपर

1. स्किपर (Pelopidas mathias) के कैटरपिलर पीलापन लिए हुए हरे

रंग के होते हैं और उनके पृष्ठ पर चार सफेद धारियां होती हैं 

2. इसका सिर बड़ा होता है और शरीर शुण्डाकार होता है। कैटरपिलर द्वारा पौधे को पत्रविहीन कर दिया जाता है। 

3. वयस्क तेज गति करने वाला स्किपर होता है।

 

 

 

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