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चावल से संबंधित विकास कार्यक्रमों के बारे में सूचना - Information about the development programs related to rice

1. बंजर एवं चावल की परती भूमि का विकास: झारखंड राज्य में लगभग 16 लाख हे. जमीन परती पड़ी हुई है और इन्हें कृषि के अधीन लाना एक चुनौतीभरा काम है, लेकिन राज्य के लिए यह बहुत जरूरी है। इसी कारण, इस कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से चलाने की सोची गई ताकि राज्य में कृषि उत्पादन में इजाफा हो और साथ ही किसानों के सामाजिक-आर्थिक दशा में सुधार लाया जा सके।

2. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): यह अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता वाली योजना है जिसे 2007-08 में शुरू किया गया था। यह निर्णय लिया गया कि RKVY राज्य की योजना होगी। इस योजना के तहत सहायता पाने की अर्हता राज्य सरकार द्वारा आधार रेखा प्रतिशत व्यय से ऊपर राज्य की बजट योजना में कृषि के लिए उपलब्ध कराई गई राशि पर निर्भर होगी। यह राज्य सरकार के प्रयासों के आधार पर कृ

निम्नभूमि पारितंत्र Low land ecosystem

1. (दोन I) रोपण धान के लिए। चिकनी-दोमट मिट्टी, उच्च विन्यास में सबसे नीचे स्थित, लंबी अवधि की धान की फसल के लिए उपयुक्त।

उपयुक्त किस्में: स्वर्ण(MTU 7029), राजश्री, साम्भा महसूरी (BPT 5204) बिरसामती।

मध्यभूमि पारितंत्र Medium land ecosystem

रोपण धान के लिए मध्य भूमि (दोन II और दोन III)

  • दोन II: चिकनी दोमट मिट्टी और चावल के उत्पादन के लिए सर्वोत्तम, सूखे का प्रकोप बहुत कम और मध्यम अवधि के धान के उत्पादन के लिए उपयुक्त।
  • दोन III: सूखा प्रभावित, चिकनी दोमट मिट्टी, दोन और टांर के बीच की भूमि, उच्चवर्ती स्थलाकृति विन्यास और अल्पावधि चावल के लिए उपयुक्त।

उपयुक्त किस्में : अंजली, बिरसा विकास धान 110, सहभागी, अभिषेक, नवीन, ललाट, आईआर 36 और आईआर 64 आदि।

उच्चभूमि या टांर भूमि पारितंत्र - Upland or Tanr land ecosystem

1. धान की सीधी बुआई के लिए उपयुक्त उच्चभूमि या टांर भूमि (टांर I, टांर II & टांर III)  

  • टांर I : घर के बिल्कुल निकट स्थित दोमट मिट्टी और भूमि। ऐसी भूमि का प्रयोग साग-सब्जी, मक्का और धान के बिचड़े उगाने के काम आते हैं।
  • टांर II : बलुई दोमट, हल्की ढाल युक्त, अच्छी गहराई, निम्न WHC, जैव पदार्थों की कमी वाली अपरदन उन्मुख और अम्लीय मिट्टी।
  • टांर III : तराई इलाके की बलुई दोमट, ढाल-युक्त, अनुर्वर, कम गहराई वाली, निम्न WHC और अम्लीय प्रकार की मिट्टी।

2. उपयुक्त किस्में : बिरसा धान 108, बिरसा विकास धान 109 और वन्दना इत्यादि।

झारखंड राज्य में चावल आधारित पारितंत्र का वितरण - Distribution of rice based ecosystems for Jharkhand state

झारखंड राज्य में चावल आधारित पारितंत्र

1. उच्चभूमि या टांर भूमि पारितंत्र

2. मध्यभूमि पारितंत्र

3. निम्नभूमि पारितंत्र

झारखंड राज्य का चावल की खेती के क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकरण - Distribution of rice based ecosystem zone wise for Jharkhand state

राज्य को तीन चावल उप-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। मोटे तौर पर छोटानागपुर के पठारी भाग और संथाल परगना को उप-क्षेत्र IV में आर्द्र और उपार्द्र उष्णकटिबंधीय मानसूनी प्रकार, उपक्षेत्र V में उप-आर्द्र से लेकर उपोष्ण और उपक्षेत्र VI में आर्द्र से लेकर उपोष्ण के अंतर्गत रखा जाता है। ऊबड़-खाबड़ पठार, पहाड़ियों और पर्वतों, साल भर बहने वाली नदियों के अभाव वाले इन इलकों में; खनन, औद्योगिक क्रियाकलापों और अतिक्रमण के कारण यहां के मूल घने जंगलों के नष्ट होते जाने से वनों में निवास करने वाले और प्रकृति के साथ मेल से रहने वाले आदिवासियों के जीवन में बिखराव आया है। यहां का बड़ा क्षेत्र बाढ़-सुखाड़ की समस्या से ग्रस्त होने लगा है। वर्षा अनियमित होती है और भू-जल का स्तर लगातार गिरता

चावल+अरहर(5:2) और अरहर+मूंगफली - Rice + Pigeonpea (5:2) and Pigeonpea + Groundnut farming system

1. वर्षा वाली उच्च-भूमि में चावल+अरहर(5:2) और अरहर+मूंगफली (2:6) प्रणाली को उड़ीसा और झारखंड राज्यों में किए गए अनेक ऑन-फार्म परीक्षणों में केवल चावल की तुलना में अधिक लाभकारी पाया गया।

2. यह सरल तकनीक वर्षा पर निर्भर रहने वाले किसानों के लिए बहुत उपयोगी और लाभकारी है तथा साथ ही यदि मिशन-मोड तरीका अपनाया जाए तो इससे दलहन के उत्पादन में भी सहायता मिलती है।

एकीकृत चावल-मछली-बतख पालन और चावल-मछली-सूअर पालन ( Integrated rice-fish-duck and rice-fish-pig farming system)

1.एकीकृत चावल-मछली-बतख पालन और चावल-मछली-सूअर पालन की कृषि-प्रणाली का झारखंड, छत्तीसगढ़ और प. बंगाल राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों में 30 किसानों के खेतों में सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।

2. चावल-मछली-बतख प्रणाली में निवेश किए धन से 1.45 से लेकर 6.24 तक तथा चावल-मछली-सूअर प्रणाली में 1.55 से लेकर 3.69 तक लाभ की प्राप्ति हुई।

3. इस कृषि प्रणाली ने झारखंड और प. बंगाल के विकास विभागों में काफी दिलचस्पी पैदा की। इनमें से एक मॉडल को झारखंड के दुमका में ATMA परियोजना द्वारा अपनाया गया।

झारखंड राज्य की चावल आधारित कृषि प्रणालियां - Rice based farming Systems of Jharkhand

झारखंड राज्य की चावल आधारित कृषि प्रणालियां

1. एकीकृत चावल-मछली-बतख पालन और चावल-मछली-सूअर पालन

2. चावल+अरहर(5:2) और अरहर+मूंगफली

(Improved storage structures of Jharkhand) झारखंड की उन्नत भंडारण संरचनाएं

उन्नत भंडारण संरचनाएं हैं-

1. उन्नत कोठियां

2. ईंट निर्मित गोदाम

3. सीमेंट से प्लास्टर की हुई बांस की कोठियां

4. CAP (कवर एंड प्लिंथ) भंडार

5. सायलो

1. उन्नत कोठियां: विभिन्न संगठनों ने वैज्ञानिक विधियों से अनाज भांडारण के लिए विभिन्न प्रकार की उन्नत कोठियों का विकास किया है जो आर्द्रता रोधी और कृंतक रोधी होती हैं। ये हैं- पूसा कोठी, नन्दा कोठी, पीकेएस कोठी, पीएयू कोठी, हापुर कोठी, चित्तौड़ कोठी आदि।

2. ईंट निर्मित गोदाम: ये ईंट की दीवारों के बने होते हैं और इनके फर्श प्लास्टर किए होते हैं जिनपर बड़ी मात्रा में धान/चावल या उनकी बोरियां रखी जाती हैं।

3. सीमेंट से प्लास्टर की हुई बांस की कोठियां: इस कोठी का विकास पोस्ट हार्वेस्ट टेक्नोलॉजी सेंटर, खड़गपुर द्वारा कियागया। इस कोठी के निर्माण में बांस की खपच

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