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Sep

Uses उपयोग

चावल एक प्रमुख खाद्यान्न है और इसका उपयोग अनेक रूपों में किया जाता है। 1. मुख्य भोजन: दुनिया की आबादी का 60% हिस्सा चावल को मुख्य भोजन के रूप में अपनाता है। चावल पका कर खाना भोजन का सबसे लोकप्रिय रूप है। इसे अनेक प्रकार के घरेलू रूपों में खाया जाता है, जैसे- खिचड़ी, पुलाव, खीर, जीराराइस, इडली, डोसा इत्यादि। 2. स्टार्च: चावल का स्टार्च आइसक्रीम, कस्टर्ड पाउडर, पुडिंग, जेल, पेय अल्कोहल आदि के डिस्टिलेशन हेतु प्रयुक्त होता है। चावल के कण: ब्रेड, स्नैक्स, कुकीज़ और बिस्कुट जैसे खाद्य उत्पादों के निर्माण में प्रयुक्त होता है। वसा रहित चावल के कण पशु आहार, जैविक खाद (कंपोस्ट) के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं और साथ ही इनका औषधीय उद्देश्यों तथा मोम के निर्माण के लिए भी उपयोग किया जाता है। 3. चावल की भूसी से तेल: चावल की भूसी से तेल खाद्य तेल, साबुन और वसा अम्ल के निर्माण के लिए इस्
1. डायरेक्टरेट ऑफ मार्केटिंग एंड इंस्पेक्शन(DMI) 2. भारतीय खाद्य निगम (FCI) 3.सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन (CWC) 4. कृषिगत एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकार (APEDA) . 5. राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम (NCDC). 6. विदेश व्यापार के महानिदेशक, (DGFT). 7. राज्य कृषि विपणन बोर्ड(SAMBs).
1. संस्थागत साख कृषि के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2. राष्ट्रीय कृषि नीति का लक्ष्य 10वीं योजना के दौरान 4% की वार्षिक विकास दर हासिल करना है 3. कृषि साख के विषय पर गठित कार्य बल ने 10वीं योजना के दौरान 5वर्षों के लिए 736570 करोड़ रु. के प्रवाह का अकालन किया है। 1996-97 के दौरान कृषि के लिए कुल संस्थागत साख का प्रवाह 26,411 करोड़ था, जो कि 2002-03 के दौरान बढ़कर 82,073 करोड़ हो गया। 4. मुख्य किसानों को, खासकर छोटे और सीमांत किसानों को आधुनिक तकनीक और उन्नत कृषि-विधियां अपनाने के लिए पर्याप्त और समयबद्ध साख सहायता उपलब्ध कराने पर दिया गया। 5. संस्थागत साख सहकारी संस्थाओं द्वारा उपलब्ध कराया जाता है जिसका लक्ष्य है 2002-2003 के दौरान कृषि क्षेत्र के अंतर्गत ग्रामीण साख के प्रवाह में 43% का योगदान देना। इस संदर्भ में व्यावसायिक बैंकों का योगदान 50% और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का योगदान 7% रहा। 6. कृ
1. कृषि विपणन सूचना नेटवर्क 2. ग्रामीण भंडारण योजना(ग्रामीण गोदाम योजना) 3. एगमार्क ग्रेडिंग एवं मानकीकरण 4. अल्पविकसित राज्यों के लिए सहकारी विपणन, प्रसंस्करण, भंडारण आदि की योजनाएं 5. मूल्य समर्थन योजना ( PSS).
1. वायदा व्यापार का अर्थ है क्रेता और विक्रेता के बीच एक निश्चित समय पर बाजार में आपूर्ति हेतु तय मूल्य पर अनाज की मात्रा के लिए समझौता किया जाना। 2. यह एक प्रकार का व्यापार है जो कृषि उत्पादों के मूल्य को स्थिर रखने में मदद करता है और किसानों को बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है। उत्पादक, व्यापारी और मिल मालिकों द्वारा भविष्य के अनुबंधों का इस्तेमाल कीमत के जोखिम को हस्तांतरित करने में किया जाता है। 3. 1952. वर्तमान में, देश का भविष्योन्मुखी बाजार फॉर्वर्ड कॉन्ट्रैक्ट (रेगुलेशन) एक्ट 1952 द्वारा विनियमित किया जाता है। 4. फॉर्वर्ड मार्केट कमीशन (FMC) भविष्य में वायदा व्यापार विनियमन के लिए सलाहकार, निगरानीकर्ता और पर्यवेक्षक की भूमिका निभाता है। 5. अधिनियम के तहत पंजीकृत संगठनों के स्वामित्व वाले एक्सचेंज के जरिए वायदा व्यापार के ले
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सहकारी विपणन

1. सहकारी विपणन मार्केटिंग की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें उत्पादकों का एक समूह एक साथ मिलकर अपने उत्पादों की मार्केटिंग के लिए स्वयं को राज्य सहकारी अधिनियम के तहत पंजीकृत करते हैं। 2. सदस्य कई सहकारिता विपणन क्रियाओं में भी शामिल होते हैं जैसे- उपज का प्रसंस्करण, ग्रेडिंग, पैकिंग, स्टोरेज, परिवहन, वित्त आदि। 3. सहकरिता विपणन का अर्थ है सदस्यों की उपज क सीधे बाजार में बेचा जाना जिससे उन्हें अच्छी से अच्छी कीमत मिले। 4. यह सदस्यों को बेहतर किस्म के धान/चावल के उत्पादन में मदद करता है जिनकी बाजार में अच्छी मांग होती है। यह अनाज का साफ-सुथरा परिचालन, उचित व्यापार व्यवहार और हेराफेरी या अनियमितता के विरुद्ध सुरक्षा भी उपलब्ध कराता है। 5. सहकारिता विपणन के मुख्य उद्देश्य हैं उत्पादक के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना, विपणन की लागत में कमी लाना, व्यापारियों के एकाधिक
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अनुबंध बाजार

अनुबंध बाजार: 1. “अनुबंध बाजार” विपणन की एक प्रणाली है जिसमें किसानों द्वारा जिसकी मार्केटिंग की जाती है और यह ट्रेडिंग या प्रेसेसिंग में लिप्त किसी एजेंसी के साथ की गई पूर्व-सहमति वाली बाय-बैक कॉन्ट्रैक्ट के तहत किया जाता है। 2. कॉन्ट्रैक्ट मार्केटिंग में उत्पादक उत्पादन करता है तथा कॉन्ट्रैक्टर को माल की आपूर्ति करता है, जो पूर्व सहमत लागत पर अनुमानित उपज तथा कॉन्ट्रैक्टेड एकरेज के आधार पर किया जाता है। 3. इस समझौते में एजेंसी इनपुट सप्लाय देती है और तकनीकी सहायता प्रदान करती है। कंपनी ट्रांजैक्शन तथा मार्केटिंग लागत का भी संपूर्ण लागत वहन करती है। 4. अनुबंध में शामिल होने पर किसान का लागत जोखिम कम हो जाता है तथा एजेंसी कच्चा माल की गैर-उपलब्धता के खतरे को कम करती है। एजेंसी द्वारा इनपुट तथा विस्तार सेवाओं में शामिल हैं- बीज, ऋण, उर्वरक, कीटनाशी, फार्म म
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प्रत्यक्ष विपणन

प्रत्यक्ष विपणन: 1. प्रत्यक्ष विपणन एक ऐसी अनोखी संकल्पना है, जिसमें कृषि उपज, जैसे धान/चावल का विपणन किसानों से सीधा उपभोक्ताओं/मिल मालिकों तक किया जाता है। इसमें किसी प्रकार के मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं होती। 2. प्रत्यक्ष विपणन से उत्पादकों तथा मिल मालिकों तथा अन्य थोक खरीददारों की परिवहन लागत कम पड़ती है। 3. यह मिलर्स तथा आयातकों को सीधा उत्पादन क्षेत्र से बड़े स्तर की विपणन कंपनियों तक पहुंचने की सुविधा प्रदान करता है। 4. किसानों से उपभोक्ताओं तक प्रत्यक्ष विपणन “अपनी मंडी” के जरिए पंजाब तथा हरियाणा जैसे कई राज्यों में लागू किया जा चुका है। 5. रिथु बाजार के जरिए आंध्र प्रदेश में कुछ सुधार लागू किए गए हैं। वर्तमान में ये बाजार राज्य के कोष के व्यय पर चलाए जा रहे हैं। यह एक समर्थन कदम है, ताकि बिचौलियों को शामिल किए बिना छोटे तथा सीमांत किसान अपनी उपज का विप
विपणन की वैकल्पिक प्रणालियों में शामिल हैं • प्रत्यक्ष विपणन, • संपर्क विपणन, • सहकारिता विपणन आदि।
विपणन संबंधी सूचना : 1. अनाज उत्पादक के लिए उत्पादन और बाजार उन्मुख उत्पादन हेतु रणनीति तैयार करने के लिए विपणन संबंधी सूचनाएं आवश्यक होती हैं। 2. व्यापार हेतु यह अन्य बाजार भागीदारों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बाजार का विस्तार: 1. बाजार का विस्तार सही विपणन करने और विपणन की बाधाओं को दूर करने में किसानों के लिए एक आवश्यक तत्त्व है साथ ही यह उनमें फसल कटाई के बाद के विभिन्न उपायों और दक्ष एवं लागत प्रभावी.... 2.विपणनशीलता: विभिन्न बाजारों में उपज की आगत और उनके मूल्य पर अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराता है। हाल ही में, भारत सरकार ने डायरेक्टरेट ऑफ मार्केटिंग एंड इनफॉर्मेशन (DMI) के जरिए कृषि विपणन सूचना नेटवर्क स्कीम लागू किया है जिसका उद्देश्य है राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के सभी कृषि उत्पाद थोक बाजारों को आपस में जोड़कर वर्तमान सूचना परिदृश्य में सुधार ल
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