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20
Sep

प्री-प्लांटिंग (Pre-planting)

1. 15 से 20 सेमी वर्षा जल भर जाने के बाद खेतों के जुताई आरंभ करें। इससे खर-पतवारों के नियंत्रण में मदद मिलती है। 

2. गीली अथवा नीची भूमि वाली कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहां जल की पर्याप्त आपूर्ति वर्षा के द्वारा अथवा सिंचाई द्वारा सुनिश्चित होती है।  

3. नीची भूमि में बीजों की सीधी बुआई नहीं होती है बल्कि बीजों को कीचड़युक्त खेत में पहले नर्सरी प्लांट के रूप में अंकुरित करते हैं और फिर खेतों में इनका रोपण करते हैं। 

4. खेत की जुताई अच्छी तरह से की जाती है और 3 से 5 सेमी जमे हुए जल में कीचड़ की तैयारी की जाती है ताकि बिचड़ा निकाले के लिए बीजशैय्या मुलायम हो सके जिससे बिचड़े की वृद्धि तेजी से हो और पोषक तत्वों और खर-पतवारों का निक्षालन हो सके। 

5. सीधी बुआई में अच्छी जुताई और भुरभुरी मिट्टी हेतु चार बार जुताई आवश्यक होती है। प्रत्येक 3 वर्ष पर बुआई से 1 – 2

फसल की विभिन्न अवस्थाओं पर जल की आवश्यकता में शामिल है

1. प्रीप्लांटिंग, नर्सरी 

2. आरंभिक वानस्पतिक अवस्था 

3. फसल के पकने की अवस्था। 

 

20
Sep

समकालिक भूमि की तैयारी

1. समकालिक भूमि की तैयारी से, किसानों का समुदाय एक ही महीने में एक ही समय पर चावल का रोपण करते हैं। भूमि की तैयारी शुरू करने से पहले फसल के बीच कम से कम एक महीने के लिए ऊसर होती है (अर्थात् बाकी अवधि के रूप में जमीन एक महीने के लिए अनछुई रहती है)। 

2. समकालिक कृषि में चावल के किसान परती भूमि में और भूमि तैयार करने की अवधि में कीटों और रोगों के चक्रों को भंग करने में सक्षम होते हैं यदि वे एकसाथ मिल कर कार्य करें। 

3. खेत में और खेतों के आसपास के क्षेत्रों में चूहों के छुपने और प्रजनन करने के स्थान को नष्ट करना खासकर चूहों के नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण होता है।  

 

20
Sep

पृथक सिंचित बीज शैय्या

1. अधिकतर नीची भूमि वाले चावल के खेतों में बीज शैय्या में बिचड़े

निकाल कर मुख्य खेतों में प्रतिरोपित किए जाते हैं। बृहद् पैमाने वाली सिंचाई प्रणाली में बीज शैय्या व्यक्तिगत रूप से किसी किसान के खेत के एक कोने में होता है।  

2. यदि बीज शैय्या की सिंचाई के लिए खेत में कोई नाले न हों, पौधे की वृद्धि के दौरान तो पूरे खेत को पानी से भर दिया जाता है। 

3. मुख्य खेत में वाष्पीकरण, रिसाव और अंत:स्रवण से जल की होने वाले सभी क्षति जल का अपव्यय है जिसके परिणामस्वरूप फसल की वृद्धि रुक जाती है। 

4. जल के अपव्यय का एक उपाय यह है कि खेतों में नाले बनाकर बीज शैय्या तक पानी पहुंचाई जाए तकि रोपण से (3-4 दिन) पहले मुख्य खेत में पानी न जाए और इसमें कीचड़ न बने। 

5. मुख्य छहर से सटा बीज शैय्या अच्छा माना जाता है ताकि खेत के नाले से पानी को लंबी दूरी तक ले जाने में पानी का कम से कम अपव्

20
Sep

मेढ़ का निर्माण और रख-रखाव

1. रिसाव और मेढ़ के अन्दर से जल के बहाव को सीमित करने के लिए

अच्छे बन्ध की पहली आवश्यकता होती है।  

2. रिसाव को सीमित करने के लिए, फसल के मौसम के आरंभ में मेढ़ काफी कसा हुआ और ठोस होना चाहिए तथा किसी प्रकार के दरारों अथवा चूहों के बिलों को कीचड़ से बन्द कर देना चाहिए। 

3. मेढ़ पर्याप्त ऊंचा (कम से कम 20 सेमी) बनाएं ताकि अधिक वर्षा के समय मेढ़ के ऊपर से पानी न बह सके। 

4. जमे हुए जल की गहराई को बनाए रखने के लिए 5 – 10 सेमी ऊंची छोटे-छोटे बान्ध बनाने चाहिए। यदि अधिक जल संचित करने की आवश्यकता हुई हो बान्धों को बन्द कर दें। 

 

20
Sep

कीचड़ की पूर्ण तैयारी

1. कीचड़ तैयार करना वह प्रक्रिया है खेतों में पानी डालकर जमे

हुए पानी में जुताई की जाती है। खर-पतवार और अन्य अवशेष मिट्टी में मिल जाते हैं।  

2. मिट्टी के कीचड़ बन जाने से रोपण में आसानी होती है। कीचड़ बनने से मिट्टी में जल लंबे समय तक बना रहता है और इसलिए जल की हानि कम हो जाती है। 

3. बार-बार जुताई करने से स्थानीय मिट्टी की संरचना नष्ट हो जाती है जो धान की फसल के लिए वांछित होता है। कीचड़ की तैयारी से अमोनिया,  P, Si, Fe तथा Mn के संग्रहन में भी सहायता मिलती है। 

4. अंत:स्रवण को कम करने में कीचड़ बनाने की दक्षता पूरी तरह से मिट्टी के गुणों पर निर्भर करती है। भारी चिकनी मिट्टी में मिट्टी में कीचड़ बनाने की आवश्यकता नहीं होती। 

 

20
Sep

भूमि को समतल करना

1. धान के खेत को उचित तरीके से समतल करना चाहिए ताकि संपूर्ण फसल के

मौसम में बेहतर जल नियंत्रण कायम रखा जा सके। 

2. सतह को डांडी की मदद से समतल करना चाहिए और फिर फाउरी ( Phyauri) (लकड़ी का बना) से करना चाहिए। 

3. लेवलिंग एक जुताई की प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी को खिसकाकर वांछित ढ़ाल की अवस्था में लाते हैं। समतल करने से जल और ऊर्वरक का प्रयोग दक्षतापूर्वक होता है। 

 

20
Sep

हल्की जुताई

1. सामान्य रूप से, बहुत से किसान बार-बार समान गहराई (12-15 सेमी) खेतों की जुताई करते हैं। परिणामस्वरूप सख्त तवे का निर्माण हो जाता है जो पौधों की जड़ों को गहराई तक जाने से रोकता है। 

2. गर्मी के मौसम में जुताई से, बार-बार सूखने और ठंडा होने के कारण, मिट्टी की संरचना उन्नत होती है। ठोस स्तर की जुताई से मिट्टी की पारगम्यता बढ़ जाती है। जुताई से मिट्टी की वायु-संचारण उन्नत होती है जिससे सूक्ष्मजीवियों के प्रजनन में सहायता मिलती है। कार्बनिक पदार्थों का अपघटन तेज हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप उच्चतर पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। 

3. बढ़े हुए वायु-संचारण से पहले वाले फसलों अथवा खर-पतवारों द्वारा छोड़े गए हर्बिसाइड्स और पेस्टिसाइड्स तथा हानिकारक ऐलिलोपैथिक रासायनों विघटन में मदद मिलती है। इससे मिट्टी में घर बनाकर रह रहे विनाशकारी कीटों को कम करने में भी मदद मि

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