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20
Sep

ऐरोबिक राइस (वायुजीवी चावल)

1. ऐरिबिक राइस वह उत्पादन प्रणाली है जिसमें विकसित “ऐरोबिक राइस”

की किस्मों को अच्छी तरह के निकास वाले, बिना कीचड़ वाले असंतृप्त मिट्टी में उगाया जाता है।  

2. समुचित प्रबन्धन के साथ, प्रणाली क लक्ष्य होता है 4-6 टन की उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त करना। बाढ़ वाली नीची भूमि के चावल की फसल की तुलना में जल की आवश्यकता 30-35% कम होती है।

3.ऐरिबिक राइस निम्नलिखित भू-भागों में उगाया जा सकता है अथवा एक उपयुक्त तकनीकी हो सकती है: 

a.  “अनुकूल ऊंची भूमि”: वह क्षेत्र जहां भूमि चपटी होती है, जहां वर्षा द्वारा अथवा सिंचाई द्वारा खेत में उसकी क्षमता के अनुसार जल स्तर बनाए रखने के लिए पर्याप्त होता है और किसान बाह्य रूप से ऊर्वरक का इस्तेमाल खेतों में होता है। 

b. खेत जो ऊंचाई पर अथवा लहरदार छत हो, वर्षा-पोषित नीचे भूमि हो। कभी-कभी, इन क्षेत्रों की मिट्टी अपेक्षाकृत

20
Sep

ऊंचा खेत (Raised beds)

1. ऊंचे खेतों वाली प्रणाली में, चावल की फसल वैसे खेतों में उगाई जाती है

जिसमें हल से अलग-अलग लकीरों बनी होती हैं द्वारा जिसमें सिंचाई का पानी प्रवाहित किया जाता है।   

2. सिंचाई इंजीनियरिंग के शब्दों में, ऊंची भूमि वाली प्रणाली की तुलना “फरो इर्रिगेशन” की जाती है। सिंचाई सविराम की जाती है और खेत की मिट्टी प्रबल रूप से वायुजीवी स्थिति में होती है; इसलिए, इस प्रणाली को वायुजीवी चावल प्रणाली के रूप में माना जाता है। 

3. सामान्यत:, खेत में हल से लकीरें बनाकर सिंचाई करने से बाढ़ की तरह सिंचाई करने की तुलना में जल का बेहतर उपयोग होता है, और ऐरोबिक राइस की सुनिश्चितता होती है। हालांकि इसकी की लंबाई-चौड़ाई में परिवर्तन हो सकता है, प्राय: लकीर की चौड़ाई 35 सेमी, हल के लकीरों की चौड़ाई 30 सेमी और गहराई 25 सेमी होती है।  

4. चावल फसल के सीधी बुआई अथवा प्रतिरोपण किया जा

1. प्लास्टिक की परत जिसमें नमी रोकने का गुण होता है, मिट्टी की नमी

को बाहर जाने से रोकता है।  प्लास्टिक की पन्नी के नीचे मिट्टी की परते से निकला जल वाष्प पन्नी की निचली सतह पर संघनित हो जाता है और जलबून्द बनकर पुन: मिट्टी में मिल जाता है।  

2. इस प्रकार नमी को अनेक दिनों तक संचित किया जा सकता है और दो सिंचाई के बीच की अवधि को बढ़ाया जा सकता है। 

3. सिंचाई का जल अथवा वर्षा जल पौधे के आसपास की पन्नी के छोद्रों द्वारा, अथवा जहां पन्नी नहीं होता है, वहां से मिट्टी में प्रवेश करता है। 

4. जल द्वारा मिट्टी का कटाव पूरी तरह रुक जाता है क्योंकि मिट्टी पूरी तरह से ढ़का होता है। 

 

1.AWD को ‘सविराम सिंचाई’ अथवा नियंत्रित भी कहा जाता है। 

2. बारी-बारी से गीला करने और सुखाने की विधि में, जमे हुए जल के सूख जाने के कुछ दिनों बाद बाढ़ की स्थिति प्राप्त होने तक सिंचाई की जाती है। 

3.AWD में बिना बाढ़ की स्थिति में सिंचाई से पहले, दिनों की संख्या 1 दिन से 10 दिनों तक हो सकती है।  

4.AWD में कुल जल के कुल निवेश के सापेक्ष जल की उत्पादकता (WPIR) बढ़ जाती है क्योंकि उपज की तुलना में जल का निवेश अधिक होता है। 

5. जल की अधिक बचत की जा सकती है और लंबे समय तक मिट्टी को सूखा रखने से जल की उत्पादकता बढ़ जाती है तथा हल्क सूखा पड़ने से पौधे पर असर पड़ता है, किंतु इससे उपल की हानि कम होती है।  

6. AWD एक परिपक्व तकनीक है जैसे चीन, भारत और फिलिपींस में व्यापक रूप से अपनाया जाता है। गुयाना में चावल के खेत में जल के विभिन्न बहिर्वाह पर AWD के आघात की गणना के लिए बहुत ही कम शोध क

20
Sep

संतृप्त सॉइल कल्चर (SSC)

1. संतृप्त सॉइल कल्चर (SSC) में, मिट्टी को जितना संभव हो संतृप्तता की अवस्था में रखा जाता है, फलस्वरूप जमे हुए जल का हाइड्रोलिक हेड कम हो जाता है जो रिसाव और अंत:स्रवण को घटाता है।  

2. SSC के व्यवहार का अर्थ है 1 सेमी जमा हुए जल स्तर प्रतिदिन बनाए रखा जाता है और प्रतिदिन सूखा दिया जाता है। 

3. यद्यपि, यह अवधारणात्मक रूप से बेहतर है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका क्रियान्वयन कठिन है क्योंकि समतल खेत में 1 सेमी जल स्तर बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। किंतु यदि परिस्थिति सही न हो तो विकल्प के तौर पर इसे अपनाया जा सकता है। 

 

20
Sep

जल के अभाव का प्रबन्धन

जल के अभाव के प्रबन्धन की विभिन्न विधियों में शामिल हैं: 

1. संतृप्त मिट्टी संरचना 

2. गीला करने और सुखाने का विकल्प  

3. खर-पतवारों को सड़ाना 

4. ऊंची भूमि 

5. वायुजीवी चावल 

6. नीची भूमि वाले क्षेत्रों में जल का प्रबन्धन 

7. निकास 

 

20
Sep

फसल पकने की अवस्था

1. फसल वृद्धि की अवधि की सबसे अंतिम अवस्था है फसल का पकना

जिसमें शामिल होता है दूध की अवस्था, डफ, पीला होना और पूर्ण रूप से पकने की अवस्था।  

2. इस अवधि में जल की बहुत कम मात्रा की आवश्यकता होती है और पीला रंग का होकर पकने की अवस्था के बाद स्थिर जल की आवश्यकता होती है। 

3. इस अवस्था में कटाई से 10 दिन पहले खेत से पानी निकाल देना चाहिए और इससे मशीन द्वारा कटाई भी आसान होती है। 

4. खेतों से पानी निकालने के बाद चूहों जैसे कुतरने वाले जीवों द्वारा क्षति की संभावना उत्पन्न होती है। 

 

 

 

 

 

20
Sep

प्रजनन की अवस्था

1. प्रजननीय वृद्धि की अवधि के अधिकांश भागों में पानी की अधिक मात्रा

खपत होती है इससे यह पता चलता है कि प्रजनन वृद्धि के दौरान चावल नमी के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। 

2. इस अवस्था जल प्रबन्धन के लिए दो तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए। इस अवस्था में सूखा पड़ने से फसल को गंभीर नुकसान पहुंचता है खासकर तब जब फूल की अवस्था से बाली निकल रहा हो। 

3. यदि पर्याप्त मात्रा में नमी की आपूर्ति नहीं की गई तो बाली का बाधित निर्माण, हेडिंग, फूल निकलने अथवा निषेचन के कारण बाली की बढ़ी हुई अनुर्वरता उत्पन्न होती है।

4. प्रजनन की अवस्था में अत्यधिक पानी से खासकर बूटिंग अवस्था में नाल (culm) की मजबूती घट जाती है और लॉजिंग बढ़ जाती है। 

5. नीची भूमि वाले चावल की फसल फूल निकलने की अवस्था में जल भंडारण के प्रति संवेदनशील होती है, और जब मिट्टी के जल का स्तर संतृप्तता से कम होता है तब सू

1. चावल के बिचड़े के प्रतिरोपण के तुरंत बाद, कल्ले निकलने के

लिए पर्याप्त जल प्रदान की जानी चाहिए। 

2. जड़ निकलने की आरंभिक अवस्था में, जल स्तर कम होने से कल्ले निकलने में मदद मिलती है और मिट्टी में जड़ मजबूती से पकड़ता है। 

3. इस अवस्था में अत्यधिक पानी से मजबूत जड़ों में गंभीर रूप से रुकावट होने से कल्ले की वृद्धि रुक जाती है। 

4. डूबे हुए पौधे के पत्ते और पत्ते का आवरण कमजोर, हल्के हरे रंग का हो जाता है और आसानी से टूट कर गिर जाता है। 

5. शुरुआती अवस्था में रोपण के तुरंत बाद जल स्तर 3 सेमी होना चाहिए और फसल की वृद्धि के साथ-साथ जल को बढ़ाकर 5-10 सेमी किया जा सकता है। 

 

20
Sep

नर्सरी (पौधशाला)

1. नर्सरी की भूमि में कीचड़ की तैयारी अच्छी तरह से करें। भूमि

को अच्छी तरह से समतल करें। 

2.सिंचाई के लिए अथवा जल निकास के लिए खेत में नाले बनाएं। खेत से पूरी तरह से जल बाहर निकालें और एकसमान रूप से बीजों का छिड़काव करें। 

3. इसके बाद 12 घंटे के लिए खेत में पानी डालें और फिर बाहर निकाल दें (यदि सूखे बीज की बुआई हो तो नर्सरी में 24 घंटे तक पानी जमा रहने दें)।

4. नर्सरी को चार दिनों तक सूखने दें।  

5. इसके बाद जब तक कि बिचड़ा न निकल जाए सिंचाई कर जल का स्तर 2 सेमी तक बनाए रखें।

6. अत्यधिक सिंचाई न करें जिससे बिचड़े की वृद्धि अवरुद्ध हो जाए। अधिक गहरी बुआई न करें ताकि बीज से बिचड़े का निकलना कठिन हो जाए। 

 

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