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1. चावल की खेती की प्रणाली चावल की खेती में पानी की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में कुछ विकल्पों में से एक है। इस प्रणाली में नर्सरी लगाने में संशोधन, रोपण के समय कोपलों की आयु, रोपण की ज्यामिति, पोषक तत्व और जल प्रबंधन शामिल हैं। 2. युवा पौधों के रोपण, बारी-बारी से गीला कर और सुखा कर वातन प्रदान करने तथा कोनो वीडिंग के फसल वृद्धि और विकास पर महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव होते हैं। 3. एस.आर.आइ के अंतर्गत अनुकूल रिज़ोस्फिअर गतिविधि के परिणामस्वरूप चावल के पौधे प्रचुरता से बढते हैं और चावल की खेती की पारंपरिक विधि की तुलना में पैदावार 15 - 20% अधिक बताई गई है। 4. एस.आर.आइ हर जगह और हर किसी द्वारा नहीं अपनायी जा सकती है। यह प्रणाली थोडी गहन है और फसल विकास के दौरान इस पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है। 5. निचले/ भारी वर्षा तथा नियंत्रण के क्षेत्रों में जहां पानी पर नियंत्र
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Aug

एस.आर.आइ की सफलता के कारण

1. युवा कोपलों का रोपण वनस्पति की वृद्धि की अवधि को लम्बा कर देता है और टिलर के अधिकतम संख्या में उत्पादन में मदद करता है। 2. बारी-बारी से गीला कर और सुखा कर निर्मित वायुजीवी परिस्थितियां और कोनो वीडिंग विपुल जड़ विकास तथा टिलरिंग को सुविधाजनक बनाते हैं। 3. कोनो वीडर द्वारा यांत्रिक निराई मिट्टी के मंथन और वीड्स के समावेश में मदद करती है जो मिट्टी को बायोमास उपलब्ध कराते हैं। 4. जड़ क्षेत्र में वायुजीवी परिस्थितियों के फलस्वरूप लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधि काफी बढ़ जाती है। 5. अनुकूल परिस्थितियों के कारण उपलब्ध कार्बन के अधिकतम उपयोग और पोषकों के कुशलतापूर्व खींचे जाने व तथा स्थानान्तरण। 6. उर्वरकों का समुचित उपयोग, जो अन्यथा खेती की पारंपरिक विधि के तहत अतिरिक्त पानी की वजह से बाहर निकल जाते हैं। 7. जैविक खादों के साथ व्यापक अंतर, वातित मिट्टी, मजबूत प
1. एस.आर.आइ के लिए असमतल, पानी के निकास की खराब व्यवस्था वाली तथा नमकीन मिट्टी का चयन न करें। विशेष रूप से खरीफ मौसम के दौरान निचले क्षेत्रों, नियंत्रण क्षेत्रों में एस.आर.आइ उपयुक्त नहीं है। 2. छोटे क्षेत्रों (अनुशंसित से कम) में नर्सरी नहीं लगाएं। 3. चिकनी मिट्टी के खेत में खास तौर से गहराई पर पडलिंग न करें जो वीड चलाने में समस्या उत्पन्न करती है। 4. नर्सरी से कोपलों को उखाडें नहीं (एक फावडे द्वारा बीज और कुछ मिट्टी के साथ धीरे से उठाएं)। 5. बहुत गहराई तक रोपण न करें, न ही खिली धूप में पानी दें। 6. मिट्टी को हटाने के लिए कोपल को धोएं नहीं। 7. क्षेत्र की सिंचाई बार-बार नहीं करें। 8. मिट्टी में गहरी दरारें नहीं बनने दें। 9. पुष्प-गुच्छ आने से पहले खेत को पानी के भराव से बचाएं। 10.खेत में पानी के बिना वीडर नहीं चलाएं। और निराई के बाद पानी बाहर नहीं जाने दें।

1. पानी पर अच्छे नियंत्रण और जल निकासी व्यवस्था के साथ एक अच्छी तरह से समतल क्षेत्र चुनें। 2. उच्च टिलरिंग क्षमता के साथ अधिक उपज देने वाली ऐसी किस्मों का चयन करें जो प्रमुख कीटों और रोगों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखती हो। 3. स्वस्थ और मोटे बीज चुनें और नर्सरी निर्धारित क्षेत्र में सावधानी से विकसित करें। 4. पानी देने के पात्र (रोज़ कैन) द्वार नर्सरी में दिन में दो बार पानी दें। 5. खरीफ में रोपण के लिए 8-12 दिन आयु के कोपल (2 पत्तियों की अवस्था) आदर्श होते हैं। रबी के मौसम में ठंडे वातावरण में रोपण के समय अंकुर की आयु 18-20 दिन (2 पत्तियों के कोपल की आयु तक) तक हो सकती है। बेहतर है, 2 पत्तियों की अवस्था के मापदंड पर विचार करें क्योंकि यह मापदंड मौसम के प्रति तटस्थ है। 6. बीज और मिट्टी के जुडे हुए कोपलों का नर्सरी से स्थानांतरण करें (ट्रे में एक घंटे के भीतर नर्सरी की आपूर्ति
1.एस.आर.आइ के कुछ तरीकों जैसे उथली गहराई पर युवा पौधों का रोपण, विशेष नर्सरी की स्थापना के लिए कौशल तथा अधिक श्रम की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से अपनाने के प्रारंभिक चरणों में। 2. एस.आर.आइ को हर जगह नहीं अपनाया जा सकता है। यह कमांड क्षेत्रों में जहां पानी की रिहाई अत्यधिक अनिश्चित हो और निचली भूमि पर जहां खरीफ के मौसम में विशेष रूप से अनियंत्रित पानी की स्थिति हो, उपयुक्त नहीं हो सकती। 3. एस.आर.आइ को अपनाने में निराई को प्रमुख बाधाओं में से एक बताया गया है। मिट्टी के अनुसार विशिष्ट कोनो निराई यंत्र की उपलब्धता अभी भी एक समस्या है और कृषि श्रमिकों के लिए कठिन श्रम कम करने हेतु यंत्रीकृत बहु पंक्ति के वीडर अभी विकसित किए जाने हैं (एक व्यक्ति को एक दिशा में कोनो वीडर से निराई करने के लिए 16 किमी/ एकड चलना होता है)। 4. चूंकि गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद (एफवायएम/खाद) पर्याप्त
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एस.आर.आइ में अधिक उपज

1. एस.आर.आइ खेती में प्रयुक्त भूमि, श्रम, जल तथा पूंजी की उत्पादकता में सुधार करती है। 2. एस.आर.आइ के लागूकरण से स्थानीय किस्मों की पैदावार 6-8 टन प्रति हेक्टेयर बेहतर बनाने में मदद मिली है। 3. एस.आर.आइ के अंतर्गत बेहतर प्रबंधन द्वारा, संकर किस्मों में 10 से 12 टन प्रति हेक्टेयर की उपज हासिल हुई है। 4. पारंपरिक तरीकों की तुलना में अक्सर एस.आर.आइ में अक्सर उपज में 20-40% की वृद्धि देखी जाती है। हालांकि, वास्तविक उपज में वृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि किसान कितने बेहतर तरीके से एसआरआई का अभ्यास करते हैं।
1. एस आर आइ के अंतर्गत व्यापक अंतर के कारण, कर पौधे को प्रति टीला अधिक बडा क्षेत्र, पोषक तत्व और रोशनी उपलब्ध होते हैं जो प्रति टीला अधिक सूखा पदार्थ और टिलर प्रदान करते हैं। 2. संसाधनों की उच्चतर उपलब्धता पारंपरिक अभ्यास की तुलना में प्रभावी टिलरों की अधिक संख्या तथा अधिक भरे हुए दाने उत्पादित करती है।
1. एस.आर.आइ में, मिट्टी की जैविक गतिविधि जैविक खाद के प्रयोग के कारण अधिकतम होती है। 2. चावल की जड़ों के आसपास मुक्त बैक्टीरिया और अन्य रोगाणुओं की गतिविधि में सुधार होता है। 3. जैविक खाद का प्रयोग भी मिट्टी के भौतिक-रासायनिक मापदंडों में सुधार लाता है जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी के स्वास्थ्य में व्यापक रूप से सुधार होता है।
1. मिट्टी में लगातार यांत्रिक हलचल तथा संसाधनों की उच्च उपलब्धता के कारण एस.आर.आइ पौधे मजबूत और स्वस्थ जड़ों का उत्पादन करते हैं। 2. खेती की एस.आर.आइ विधि में, चावल के पौधे बारी-बारी से गीला करने और सुखाने की प्रक्रिया से गुज़रते हैं और नमीगत तनाव के कारण सख्त होते हैं। 3. जबकि पारंपरिक प्रथा के अंतर्गत, निरंतर डूबे रहने के कारण जड़ें कमजोर और अधिक रेशेदार होती हैं। कम बारिश के मौसम की स्थिति में सूखा (ड्राउट) एस.आर.आइ पौधे पारंपरिक प्रथा की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

1. चूंकि, खेती की एस.आर.आइ विधियों में उर्वरक तथा कीटनाशकों का उपयोग प्रोत्साहित किया जाता है, इस विधि के अंतर्गत उत्पाद के प्रदूषण तथा मिलावट की सम्भावना कम होती है।
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