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1. अधिक दूरी तथा बारी-बारी से गीला करने व सुखाने की वज़ह से आमतौर पर एस.आर.आइ में घासफूस अधिक विकसित होती है। एस.आर.आइ की सफलता के लिए घासफूस का समय पर तथा प्रभावी नियंत्रण महत्वपूर्ण है। 2. मिट्टी में वायु प्रवेश कराने के लिए यांत्रिक वीडिंग ही अपनाएं। 3. उचित यांत्रिक वीडर का उपयोग करते हुए प्रत्यारोपण के 10 दिन बाद से वीडिंग आरम्भ करें और 10 दिन के अंतराल पर कम से कम 4 बार वीडिंग करें। 4. पौधों के पास की जो घासफूस वीडर द्वारा नहीं निकाली जा सकती है उसे हाथों से निकालें। 5. वीडर सुगमता तथा आसानी से चले, इसके लिए वीडिंग से एक दिन पहले खेत में सिंचाई करें।

1. यदि फसल की वास्तविक मांग के अनुसार वे एन डालने की मात्रा समायोजित कर सकें तो किसानों को लाभ होगा। इसका एक तरीका है लीफ कलर चार्ट (एलसीसी) (पत्ती के रंग का चार्ट)। ये माप खेत में पौधे के एन माप की निगरानी करने और ऊपर से एन डालने का समय ज्ञात करने में मदद करते हैं। डीआरआर द्वारा लीफ कलर चार्ट उचित संशोधनों के साथ चावल की उष्णकटिबन्धीय इंडिका किस्मों के लिए विकसित किया गया है। 2. एलसीसी के माप आम तौर पर प्रत्यारोपण के 14 दिनों बाद प्रति सप्ताह एक बार लिए जाते हैं। रंग क्रमांक, जो 1 से 7 तक होता है, के माप के लिए टीले में सबसे ऊपरी व सबसे अधिक फैली हुई पत्ती चुनी जाती है। रंग के मिलान के लिए पत्ती को रंग के चार्ट पर रखा जाना चाहिए। बगैर किसी निर्धारित क्रम के चुनी गई सबसे ऊपरी व सबसे अधिक फैली हुई 10 पत्तियों के रंग की तुलना चार्ट पर दी गई रेटिंग से की जाती है। जब औसत पत्ती क

1. जुताई से पहले एफवायएम/ अच्छी तरह विघटित कम्पोस्ट 4-5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से डालें और उन्हें समान रूप से संयुक्त करें। 2. मिट्टी के परीक्षण के नतीज़ों के आधार पर अकार्बनिकों के माध्यम से अनुशंसित उर्वरकों (एनपीके) की 50% मात्रा यानि 50:30:20 किलो एनपीके खरीफ में तथा 60:30:20 किलो एनपीके रबी में डालें और मिलाएं। 3. अंतिम पडलिंग से पहले अनुशंसित मात्रा की आधी एन तथा कुल पी और क्षारी तौर पर 75% के डालें तथा मिलाएं। 4. द्वितीय दीडिंग (20 डीएटी) के समय एन की दूसरी खुराक (25%) डालें और पैनिकल आरम्भ होने की अवस्था से एक हफ्ता पहले 25% एन तथा 25% के की बची हुई खुराक डालें। 5. एन के उपयोग की दक्षता को बढाने के लिए पत्ती के रंग के चार्ट की मदद से आवश्यकतानुसार एन डाला जा सकता है।
09
Aug

एस.आर.आइ में जल प्रबन्धन

1. बीच-बीच में पतली दरारें उभरने पर हल्की सिंचाई द्वारा (बारी-बारी से गीला कर और सुखा कर) पानी को बस मिट्टी की संतृप्ति के स्तर पर रखें। 2. पौधे लगाने से बूटिंग अवस्था तक, खेत को 2.5 सेमी ऊंचाई तक सिंचित किया जाना चाहिए। जब सारे पानी की निकासी हो जाए और खेत में हल्की दरारें पडने वाली हों तो खेत को पुनः 2.5 सेमी ऊंचाई तक सिंचित किया जाना चाहिए। 3. लेकिन वीडर चलाते समय पानीका हल्का आवरण रखें जो वीड चलाने में भी मदद करता है। 4. खेत से पानी के निकास के लिए और पौधों को अनावश्यक रूप से डूबने से बचाने के लिए पर्याप्त चैनल बनाएं। 5. पुष्पण की अवस्था से परिपक्वता तक स्थिर जल का उथला स्तर (2-3 सेमी) रखें। 6. कटाई से लगभग 10-15 दिन पहले खेत को पूरी तरह से सुखा दें।
09
Aug

एस.आर.आइ में अधिक दूरी

1. कोपलों को बिल्कुल अचूक अंतर पर लगाया जाना चाहिए, आमतौर पर 25x25 सेमी, लगभग 16 पौधे प्रति वर्ग मीटर। 2. सघन रूप से लगाने के बजाय यदि अधिक दूरी पर लगाए जाएं तो चावल के पौधों की जडें और छत्र बेहतर तरीके से उगते हैं। अधिक दूरी हर पौधे को सूर्य के बेहतर रोशनी, हवा और मिट्टी के पोषक तत्व उपलब्ध कराती है और वीडिंग के लिए बेहतर पहुंच प्रदान करती है। नतीज़तन हर पौधा अधिक टिलर प्रदान करता है। 3. जडें स्वस्थ रूप से तथा बडे पैमाने पर बढेंगी तथा अधिक पोषक तत्व खींचेंगी। चूंकि पौधा मज़बूत तथा स्वस्थ होता है, टिलरों की संख्या भी अधिक होती है। 4. पैनिकल की लम्बाई अधिक होगी। पैनिकल में अधिक संख्या में दाने होते हैं और दाने का वज़न भी अधिक होगा।

1, यह देखें कि प्रत्यारोपण के समय खेत में स्थिर जल नहीं हो। 2. ज़मीन तैयार करने के अंतिम दिन के अगले दिन पौधे लगानी वांछनीय है। 3. 8-12 दिन आयु के कोपल (2 पत्तियों की अवस्था) प्रत्यारोपित करें। 4. 30x30 सेमी की एक पतली धातु की शीट को बीज के बेड के नीचे डालकर कोपलें इस तरह से उचकाकर निकालें कि कोपलें बीज सहित बाहर आएं और जडों को नुकसान नहीं हो तथा प्रत्यारोपण में झटका न लगे। 5. उथली गहराई पर बहुत नाज़ुक हाथ से 25x25 सेमी के जोड पर एक कोपल प्रति टीले की दर से कोपलों को रखें। 6. युवा कोपलों को झटके से बचाने के लिए उखाडने तथा पुनः रोपने के बीच का अंतराल जितना हो सके उतना कम होना चाहिए (एक घंटे से अधिक नहीं)।

1. अनुशंसित दूरी 25 x 25 सेमी है। 2. 16 कोपल प्रति स्क्वे.मी. की दर से कोपलों के चौकोर प्रत्यारोपण के लिए तैयार मुख्य खेत की लम्बाई एवं चौडाई में उचित मार्कर चलाकर 25 x 25 सेमी पर पंक्तियों के कटाव बनाएं। 3. उचित मार्किंग के लिए समान गति से मार्करों को खींचें। 4. यदि मार्कर उपलब्ध नहीं हों तो दोनों दिशाओं में 25 सेमी पर निशान लगाई गई पारम्परिक प्रत्यारोपण कडियों का इस्तेमाल करें। 5. कतार में प्रत्यारोपण के लिए अलग प्रकार के मार्कर विकसित किए गए हैं। तैयार खेत की लम्बाई तथा चौडाई में इन मार्करों को चलाने की आवश्यकता होती है।

1. एस.आर.आइ के लिए मुख्य खेत की तैयारी पारम्परिक विधि की तरह ही होती है। हालांकि उचित लेवलरों द्वारा खेत को समतल करने के लिए सावधानी बरती जानी चाहिए। 2. नर्सई की बुवाई के तुरंत बाद मुख्य खेत तैयार करना आरम्भ कर दें। 3. जुताई से पहले 4 टन प्रति एकड अच्छी तरह विघटित एफवायएम या कम्पोस्ट डालें और रोटोवेटर से अच्छी तरह मिलाएं। 4. बैल या ट्रैक्टर द्वारा खींचे जाने वाले ‘पडलर’ से दो बार खेत को ‘पडल’ करें। 5. लकडी के पटियों द्वारा खेत को अच्छी तरह समतल करें और खेत को छोटे टुकडों में बांटें और प्लॉटवार पटियों के साथ काम करें। प्रभावी जल प्रबन्धन के लिए प्लॉटवार स्वतंत्र सिंचाई/ जल निकास के चैनल बनाएं। 6. प्रारम्भिक अवस्था के दौरान पानी में डूबने से बचाने के लिए हर 2 मीटर पर चैनल अनिवार्य हैं।
1. 2-3 किलो अंकुरित बीज के समूह को 4 बराबर भागों में विभाजित करें और हर समूह की एक समान बुवाई सुनिश्चित करने के लिए एक बार में एक बेड पर (1x10 मीटर) पर छिडकाव करें। 2. बीज को एक समान तथा सावधानीपूर्वक फैलाएं। नमी सोखने की सम्भावना से बचने के लिए बीज का फैलाव विशेष रूप से शाम को करना वांछनीय है। 3. केवल बीज को ढकने के लिए बीज को 10 किलो प्रति बेड की दर से अच्छी तरह विघटित एफवायएम से और उसके बाद धान के पुआल से ढकें ताकि नर्सरी पक्षियों द्वारा नुकसान से बचाई जा सके और 2-3 दिन तक उसका ज़्यादा गर्मी से सामना नहीं हो। 4. छिडकाव के पात्र (रोज़ कैन) द्वारा बेड पर रोज़ाना दो या तीन बार (सुबह, दोपहर तथा शाम को) पानी का छिडकाव करें।
1. फार्म यार्ड मैन्योर (एफवायएम)/ वर्मि-कम्पोस्ट तथा मिट्टी को एक के बाद एक, 4 परतों में निम्नलिखित तरीके से डालें। 2. पहली परत: 1-2 सेमी मोटाई की अच्छी तरह से अपघटित एफवायएम/ वर्मि-कम्पोस्ट। 3. दूसरी परत: 2 सेमी मिट्टी 4. तीसरी परत: 3 सेमी मोटाई की अच्छी तरह से अपघटित एफवायएम/ वर्मि-कम्पोस्ट। 5. चौथी परत: 1 से 2 सेमी मिट्टी के साथ अच्छी तरह से मिलाएं या अच्छी तरह से मिली हुई मिट्टी और एफवायएम को 1:1 के अनुपात में नर्सरी बेड की तैयारी मे लिए लें।
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