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1. भारत के कई भागों में खेतों में नहरें (अथवा “तीसरी श्रेणी” सिंचाई

अथवा निकास नहर) 

2. मेढ़ों में बने दरारों से होकर जल एक खेत से दूसरे खेत में बह जाते हैं। इसे ‘प्लॉट-टु-प्लॉट’ सिंचाई कहते हैं।  

3. चावल के खेत में आने वाली और निकलने वाली जल की मात्रा का नियंत्रण नहीं किया जा सकता और खेत-विशेष में जल का प्रबन्धन संभव नहीं होता।  

4. इसका अर्थ यह है कि कटाई से पहले किसान खेत से जल के निकास में सक्षम नहीं हो पाते क्योंकि दूसरे खेतों से जल का बहना जारी रहता है। 

5. साथ ही, यदि ऊंची भूमि वाले किसान अपने खेतों में जल रखना चाहें अथवा कटाई की तैयारी के लिए खेतों को सुखाएं, तो नीची भूमि वाले किसान अपने खेतों में जल का प्रवाह नहीं बना पाते। 

6. इसके अलावा,  जल के अभाव से निपटने के लिए बहुत की तकनीकों के लिए आवश्यक है प्रत्येक खेत का जल नियंत्रण बेहतर हो। अंत

20
Sep

नीची भूमि का जल संतुलन

1. चावल की नीची भूमि की बाढ़ की प्रकृति के कारण इसका जल संतुलन और जल उत्पादकता, अन्य अनाजों जैसे गेहूं और मक्के, से अलग होती है।

2. चावल की नीची भूमि वाले खेत में जल का निवेश रिसाव, अंत:स्रवण, वाष्पीकरण और प्रस्वेदन द्वारा होने वाली जल की क्षति की पूर्ति के लिए आवश्यक हो जाता है। 

3. रिसाव पार्श्व सतह पर जल का प्रवाह है और अंत:स्रवण जड़ क्षेत्र के नीचे का जल प्रवाह है।  

4. रिसाव और अंत:स्रवण के लिए प्रारूपी संयुक्त मान 1-5 मिमी d-1 भारी चिकनी मिट्टी में और 25-30 मिमी d-1 रेतीली मिट्टी और रेतीली दुमट मिट्टी में पाया जाता है।  

5. जमे हुए जल की सतह पर वाष्पीकरण होता है और प्रस्वेदन पौधे के पत्तों से होकर जल की क्षति है। चावल के खेत की वाष्पीकरण-प्रस्वेदन की संयुक्त प्रारूपी दर आर्द्र मौसम में 4-5 मिमी d-1 और शुष्क मौसम में 6-7 मिमी d-1, लेकिन ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मानसून आन

20
Sep

जल प्रबन्धन के सिद्धांत

• अत्यधिक नमकीन और खारा पानी सिंचाई के लिए उपयुक्त नहीं होता। 

• FYM का अनुप्रयोग और हरे खाद के अवशेष का अनुप्रयोग अत्यधिक नमक के बुरे प्रभाव को कम करता है। 

• FYM का अनुप्रयोग अथवा कम्पोस्ट अथवा हरे खाद का अवशेष हल्की संरचना वाली मिट्टी में जल धारण करने की क्षमता को बढ़ाता है और इसलिए जल की बचत होती है। 

• उच्च जल उपयोग दक्षता के लिए खेत का प्रबन्धन करना। 

• कीचड़ के अपारगम्य स्तर से गहरी अंत:स्रवण क्षति में कमी आती है। 

• खेत के अच्छी तरह से समतल होने से संपूर्ण खेत में जल की एकसमान गहराई होती है। 

• उच्च जल उपयोग दक्षता और उपज के लिए खेत में जल की अनुशंसित गहराई को बनाए रखें।

 

20
Sep

जल प्रबन्धन

1. प्रभावी जल प्रबन्धन के लिए, खेत का समतल होना जरूरी होता है। रोपण के समय जल का स्तर 1 से 2 सेमी बनाए रखे और पौधों को संभलने और कल्ले फूटने के समय जल का स्तर बढ़ाकर 3 – 5 सेमी गहरा करें।   

2. कल्ले फूटने की अधिकतम अवस्था के बाद, अनुत्पादक कल्ले को रोकने के लिए खेत से जल के निकासी कर दें और साथ ही पौधे की एकसमान वृद्धि और विकास होती है। 

3. फूल की अवस्था के दौरान जल का स्तर 3 से 5 सेमी तक बनाए रखें। कटाई से लगभग 5 – 7 दिन पहले खेत से पानी निकाल दें। 

4. जल प्रबन्धन में खेत में लगातार पानी रखने की बजाए चक्रीय रूप से पानी रखने से अत्यधिक मात्रा में जल की बचत होती है। 

 

 

1. "पैराशूट चावल प्रतिरोपण तकनीक" में लचकदार प्लास्टिक के

ट्रे में बिचड़ों को रोपा जाता है। 

2. इस ट्रे के निचले हिस्से में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं ताकि मिट्टी से मिट्टी के नीचे केशिका के क्रियाकलाप द्वारा जल तथा पक तत्वों का आवगमन बना रहे।

3. बाद में इस ट्रे को धान के खेत में ले जाता जाता है, जहां धान के शिशु पौधों को खेत में छिटपुट रूप से फेंका जाता है।

4. धान के शिशु पौधे की भारी जड़ यह सुनिश्चित करता है कि पौधा जड़ की ओर से ही मिट्टी में गिरे।  

5. इस तकनीक में प्रति हेक्टेयर अच्छी उपज की संभावना होती है। 

 

20
Sep

हाथ से रोपण की सीमाएं

1. चावल के सीधी बुआई की तुलना में प्रतिरोपित चावल के वृद्धि के अवधि लंबी होती है। 

2. एक हेक्टेयर में रोपण के लिए, 30-40 व्यक्ति/दिन की आवश्यकता होती है। 

3. शिशु बिचड़े को अधिक गहराई में रोपने पर निचली गांठ से कल्ले नहीं निकलते हैं। 

4. यदि शिशु बिचड़े को कम गहराई में रोपी जाए तो बहते जल में यह उखड़ जाता है। 

5. उचित दूरी बनाए रखने में कठिनाई होती है। 

 

1. समतल खेत में 20X10 सेमी अथवा 20X15 पर 2 से 3 बिचड़े का रोपण करें।

1. बिचड़े की आवश्यक अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद अर्थात् 4

पत्ते वाले अवस्था अथव कम अवधि वाले किस्म में बुआई के लगभग 21 से 25 दिन बाद और लंबी अवधि वाले किस्म में बुआई के 30 से 35 दिन बाद रोपण करती चाहिए। 

2. बिचड़े को इस प्रकार उखारना चाहिए ताकि इसकी जड़ को नुकसान न पहुंचे और पौधे से नमी की क्षति न हो इसलिए छांव में रखें। नर्सरी की मिट्टी कड़ी हो तो उखारने से पहले पानी डाल कर इसे मुलायम करें ताकि मिट्टी के कण बिचड़े की जड़ से अलग हो जाएं।  

3. 20X10 सेमी अथवा 20X15 पर 2 से 3 बिचड़े का रोपण करें (समतल खेत में)।

4. रोपण के बाद तेज पुनर्जीवन और तेज विकास को सुनिश्चित करने के लिए बिचड़े का परिचालन सावधानीपूर्वक करें। 

 

1. नीची भूमि में चावल के लिए प्रतिरोपण एक मूल्यवान सांस्कृतिक

व्यवहार है।

2. नीची भूमि और सिंचित भूमि के लिए इसकी अनुशंसा की जाती है। 

3. इस विधि में कम सिंचाई की आवश्यकता होते है, कम खर-पतवार निकलते हैं और बीज की मात्रा कम लगती है तथा उपज अधिक होती है। 

4. जाड़े के फसल के लिए फसल की अवधि को बढ़ाने हेतु तथा सिंचाई को कम करने के लिए किसान चावल धान का प्रतिरोपण करते हैं। 

5. चावल के प्रतिरोपण से चावल तथा जलवायु की सीमाओं के मद्देनजर मेल खाते फसल विन्यास के साथ जाड़े की फसल के दोहरे और तिहरे फसल की सुविधा प्राप्त होती है। 

6. चावल के प्रतिरोपण से फार्म में खेतों के प्रबन्धन की दक्षता बढ़ती है। 

 

20
Sep

मशीन रोपण की सीमाएं

1. किसानों के स्तर पर भूमि का अच्छी तरह से समतल होना कठिन होता है। 

2. विशेष नर्सरी बनाने की आवश्यकता होती है।

3. फार्म में चलने के लिए रास्ता बनाने में कठिनाई होती है। 

4. सूखे और वर्षापोषित परिस्थिति में मशीन ट्रांसप्लांटिग कठिन नहीं होता। 

5. मशीन के उचित प्रयोग के लिए उपयुक्त ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है। 

 

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