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20
Sep

स्प्रिंकलर द्वारा सिंचाई

• स्रिंकलर इरिगेशन सिस्टम में जल दबाव के साथ पाइपों में प्रवाहित होता है और बारिश की बून्दों की तरह खेत में स्प्रे होता है। इसे ‘ओवर हेड’ सिंचाई कहते हैं। 

• विभिन्न प्रकार के स्प्रिंकलर सिस्टम प्रचलित हैं जैसे पोर्टेबल, सेमी-पोर्टेबल, सेमी-पर्मानेंट और पर्मानेंट। लेकिन बढ़ते श्रम और बिजली के लागत के कारण विभिन्न प्रकार के स्प्रिंकलर्स विकसित किए गए हैं। 

• सेंटर-पाइवट एक बड़ा स्प्रिंकलर सिस्टम है और एक मशीन से 100 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा सकती है। सेंटर-पाइवट में पार्श्व पाइपों में बहुत से स्प्रिंकलर्स लगे होते हैं, 50 - 800 मी लंबा, माउंटेड होता है अथवा पांच या उससे अधिक मोबाइल टोअर्स द्वारा परिवहन किया जाता है। 

• पाइवट पैड पर लैटरल का एक सिरा फिक्स होता है। सेंटर पाइवट के चारों ओर यूनिट घूर्णन करता है जहां जल को पाइप में पम्प किया जाता

20
Sep

ड्रिप सिंचाई

• यह छोटे पैमाने पर होता है, जल निकलने वाले बिन्दु पर स्थित एमिटर्स अथवा ऐप्लिकेटर्स कहे जाने वाले यंत्र द्वारा रुक-रुक कर अथवा बारी-बारी से अथवा स्प्रे के रूप में जल का धीमा अनुप्रयोग होता है। 

• इसे ट्रिकल इरिगेशन भी कहते हैं। गंभीर जलाभाव वाले क्षेत्रों में, खासकर नारियल, अंगूर, केला, खट्टे फल, गन्ना, कपास, मक्का, टमाटर, बैंगन और प्रतिरोपित किए जाने वाले फसलों के लिए, ड्रिप इरिगेशन को व्यापक रूप से अपनाया जाता है। ड्रिप इरिगेशन के निम्नलिखित फायदे हैं: 

• स्थानीय अनुप्रयोग के कारण ऊर्वरक की क्षति नहीं होती। 

• उच्च जल वितरण दक्षता। 

• खेतों को समतल करना आवश्यक नहीं होता। 

• केवल जड़ का भाग ही संतृप्त होता है। 

• जड़ के क्षेत्र में खेत की क्षमता पर नमी मौजूद रहता है। 

• सिंचाई की बारंबारता में मिट्टी के मामले महत्वपूर्ण भूमिक

20
Sep

लघु सिंचाई (Micro Irrigation)

लघु सिंचाई में दो प्रकार की सिंचाई होती है:

1. ड्रिप सिंचाई (Drip irrigation)

2.स्प्रिंकलर द्वारा सिंचाई (Sprinkler irrigation)

20
Sep

जल निकास (Drainage)

1. किसी भू-भाग से सतही अथवा उप-सतही जल का प्राकृतिक अथवा

कृत्रिम रूप से बाहर निकालना निकास कहलाता है। बहुत से कृषि भूमि को उत्पादन को बढ़ाने के लिए अथवा जलापूर्ति के प्रबन्धन के लिए निकास की आवश्यकता होती है। 

2. गीले प्रदेश की मिट्टी में कृषि के लिए निकास की आवश्यकता होती है। 

3. तटीय मैदानों और नदी के डेल्टा में मौसमी अथवा स्थाई रूप से ऊंचा जल स्तर रहता है और यदि उनका इस्तेमाल कृषि में किया जाए तो जल निकास की आवश्यकता होती है। 

4. सिंचाई के जल में हमेशा खनिज और लवण शामिल रहते हैं, जो वाष्पीकरण-प्रस्वेदन द्वारा सान्द्र होकर जहरीला हो सकता है। सिंचाई के जाने वाली भूमि में कुछ्कुछ दिनों में अत्यधिक सिंचाई द्वारा फ्लश करने और निकास करने की आवश्यकता होती है ताकि मिट्टी की लवणीयता नियंत्रित रहे।

5. खेत से जल का निकास फसल लगने के समय, अधिक वर्षा के समय, और फ

1. नीची भूमि वाले चावल की फसल में जल का निवेश रिसाव, अत:स्रवण, वाष्पीकरण और प्रस्वेदन के द्वारा होने वाली जल की क्षति की पूर्ति के लिए किया जाता है।

2. रिसाव पार्श्व सतह से जल का प्रवाह है और अंत:स्रवण जड़ क्षेत्र के अन्दर जल का नीचे की ओर प्रवाह है। रिसाव और अंत:स्रवण का आदर्श संयुक्त मान भारी चिकनी मिट्टी में 1-5 मिमी d-1 से लेकर रेतीली अथवा रेतीली दोमट मिट्टी में 25-30 मिमी d-1 होता है।  

3. वाष्पीकरण जमे हुए जल में होता है, चावल के उत्पादन में जल के अभाव की समस्याओं को दूर करने में पौधे के पत्तों द्वारा प्रस्वेदन से जल की हानि होती है। चावल के खेत में वाष्पीकरण-प्रस्वेदन का संयुक्त दर आर्द्र मौसम में 4-5 मिमी d-1 और सूखे मौसम में 6-7 मिमी d-1 होता है, लेकिन  मानसून के आगमन से पहले उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक से अधिक 10-11 मिमी d-1 हो सकता है।  

4. चावल के खेतों में मौसमी जल का

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