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24
Sep

B की कमी के कारण

1. अत्यंत ऋतुक्षरित अम्लीय उच्च भूमि की मिट्टियां (उच्च Al) तथा मोटी संरचना वाली बलुई मिट्टी। 

2. यह गर्मियों के मौसम में उत्पन्न होता है (नमी की कमी के कारण) तथा सूखी मिट्टी (सूखा) में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कम होने से पैदा होती है। 

3. मोटी संरचना वाली मिट्टियों में उच्च वर्षा के कारण होने वाले निक्षालन के कारण भी की कमी पैदा होती है। ऐसा  B जो मिट्टी के घोल में नॉनियोनाइज्ड अणु के रूप में पाया जाता है, जलमग्न मिट्टी में अधिक गतिशील होता है। 

4. च्च मृदा pH (नमकीन सॉडिक मिट्टियां)।

5. निम्न कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी। 

 

24
Sep

B की कमी के कारण

1. अत्यंत ऋतुक्षरित अम्लीय उच्च भूमि की मिट्टियां (उच्च Al) तथा मोटी संरचना वाली बलुई मिट्टी। 

2. यह गर्मियों के मौसम में उत्पन्न होता है (नमी की कमी के कारण) तथा सूखी मिट्टी (सूखा) में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कम होने से पैदा होती है। 

3. मोटी संरचना वाली मिट्टियों में उच्च वर्षा के कारण होने वाले निक्षालन के कारण भी की कमी पैदा होती है। ऐसा  B जो मिट्टी के घोल में नॉनियोनाइज्ड अणु के रूप में पाया जाता है, जलमग्न मिट्टी में अधिक गतिशील होता है। 

4. उच्च मृदा pH (नमकीन सॉडिक मिट्टियां)।

5. निम्न कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी। 

 

24
Sep

B की कमी के लक्षण

1. प्रभावित पौधे की ऊंचाई कम रहती है तथा नई पत्तियों के शिखाग्र  Ca की कमी की स्थिति की तरह ही लिपटे होते हैं और गंभीर कमी की स्थिति में पौधा सूख जाता है।  

2. परागनली की वृद्धि/निषेचन की कमी (अनाज की घटी हुई संख्या) के कारण बढ़ी हुई अनुर्वरता।

3.B की कमी यदि गंभीर हो, तो चावल का पौधा पुष्प-गुच्छ उत्पन्न करने में असफल हो सकता है। 

 

24
Sep

बोरॉन (B)

1.B की आवश्यकता लिग्निन, सायनीडिन (ल्यूको सायनीडिन)/पॉलीफेनॉल्स के संश्लेषण में होती है तथा इसके आदर्श इस्तेमाल से पौधे में कवकों (विल्ट्स/ रस्ट) के प्रति तथा वायरल रोगों से बचाव होता है। 

2.B के समुचित इस्तेमाल से भी कीटों से बचाव में मदद मिलती है। 

 

24
Sep

B के कार्य

1. संवहनी ऊतक (फ्लोएम/ जाइलम) के विकास में आवश्यक। 

2. कॉम्लेक्सेज के निर्माण के जरिए कार्बोहाइड्रेट के परिवहन को बढ़ावा देना। 

3. सुक्रोज के संश्लेषण में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहता है। 

4. पौधों की प्रतिरक्षी प्रणाली में कार्य करता है, क्योंकि यह लिग्निन, शिकिमेट मार्ग के जरिए फाइटोऐलेक्सिन्स के जैव-संश्लेषण में भाग लेता है। 

5. पराग के अंकुरण/निषेचन में मदद करता है और इस प्रकार दाने/पुष्प-गुच्छ की संख्या में वृद्धि करता है।  

6. कोशिका भित्ति का संश्लेषण तथा लिग्नीफिकेशन में भूमिका निभाता है। 

 

24
Sep

Mn विषाक्तता का प्रबंधन

1. जहां कहीं भी संभव हो मध्य मौसम के जल निकास की व्यवस्था करना। 

2. पुआल /राख के इस्तेमाल के जरिए Si तथा K की आपूर्ति करना।

3. बेसिक स्लैग @ 1.5 - 5.0 t ha-1 के इस्तेमाल से Si पोषण में सुधार लाना जो Mn विषाक्तता को कम करता है। 

4. चूने के साथ उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करना (NPK + कूना @ 1-2 t ha-1) – जिससे पोषण की कमी से बचा जा सके। 

 

24
Sep

Mn विषाक्तता के कारण

1. काफी क्षीण निम्न भूमि मृदा जिसका अम्लीय pH (< 5.5) हो। 

2. अम्ल सल्फेट मिट्टियां 

3.Mn के खनन से प्रभावित (प्रदूषित) क्षेत्र, Mn पदार्थ वाले औद्योगिक कचरे। 

 

24
Sep

Mn विषाक्तता के लक्षण

1. निचले पत्र फलक तथा आवरण पर भूरे धब्बे का उभरना। 

2. दो महीने पुरानी फ़सल में पत्तियों की टिप्स का सूखना।

3.Fe की कमी की तरह ही नई पत्तियों में क्लोरोसिस।

4 .उच्च शूकि अनुर्वरता। 

 

24
Sep

Mn की कमी का प्रबंधन

1.5 –10 kg ha-1 Mn का MnSO4 (25-30% Mn) के जरिए मृदा अनुप्रयोग की सलाह दी जाती है। MnSO4 का स्रोत चूंकि MnO2 (40% Mn) तथा MnCO3 (31% Mn) की तुलना में अधिक तीव्रता से कार्य करता है, इसलिए इसकी कमी वाली मिट्टी में इसका प्रयोग करना चाहिए। 

2. तीव्र रिकवरी के लिए 0.2 से 0.5 % MnSO4 का पत्र छिड़काव करना चाहिए, जो टिलरिंग की अवस्था से आरंभ किया जाना चाहिए। कई बार 3-4 दिनों के अंतराल पर बहु-अनुप्रयोग (तीन बार) की आवश्यकता पड़ती है।  

3. चावल-गेहूं प्रणाली में  Mn की घुलनशीलता पर जल-जमाव के अनुकूल प्रभाव के कारण, चावल की फ़सल को आम तौर पर Mn की कमी नहीं झेलनी पड़ती है। 

4.ID दशाओं में उगने वाले गेहूं की फ़सल Mn की कमी से प्रभावित होती है। ऊपर दर्शाए अनुसार MnSO4 का पत्र छिड़काव का सुझाव दिया जाता है, क्योंकि मिट्टी में डाला गए Mn को चावल के अगले मौसम में हानि की संभावना बनी रहती है। 

 

24
Sep

Mn की कमी के कारण

1. मिट्टी में Mn सामग्री की कम उपलब्धता (वर्षापूरित उच्च भूमि की चावल वाली मिट्टी)।

2. अत्यधिक Fe सामग्री (अपघटित /अम्ल सल्फेट वाली मिट्टी).

3. निक्षालित गैर-जलमग्न बलुई मिट्टी (पंजाब में खरीफ चावल के मौसम में अत्यधिक निक्षालन के कारण Mn की कमी से गेहूं को काफी नुकसान पहुंचता है।)

4. अत्यधिक ऋतुक्षरित अम्लीय उच्च भूमि की मिट्टियां (जलोढ़  मिट्टी)।

5. कार्बनिक मिट्टियां (पीट / हिस्टोसोल्स), अम्लीय मिट्टियों का अत्यधिक चूनाकरण।

6.NO3 –N, Ca, Mg तथा Zn का उच्च सांद्रण। 

 

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