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• ऐसी फ़सल जो सामान्यतः खर-पतवारनाशियों के प्रति संवेदनशील होती हैं, उन्हें जैव-तकनीकी विधियों द्वारा खर-पतवारनाशी के प्रति प्रतिरोधी बनाया जा सकता है। कई प्रकार के खर-पतवारनाशियों के लिए प्रतिरोधन जीन को मक्के, कपास, कैनोला तथा सोयाबीन के जीनोम में समावेशित किया गया है।

• USDA सर्वेक्षण डेटा ने संकेत दिया कि HT सोयाबीन ने 1997 के 17% के एकरेज से 2001 में 68% तथा 2009 में 91% का एकरेज दिखाया। HT कपास का रोपण अमेरिका में कपास के रोपण का 10 % (1997) था जो 2001 में 56 % तथा 2009 में 71% रहा। HT मक्के के इस्तेमाल से जो पिछ्ले साल कम रहा, वह 2009 में अमेरिका मक्का के उपज का 68% तक पहुंच गया। 

• खर-पतवार के दक्ष प्रबंधन में  HT फ़सल के इस्तेमाल से फ़सल को कम से कम नुकसान होता है। यह तकनीकी छोटे/सीमांत किसानों के लिए भी काफी उपयोगी है। इससे जुताई संरक्षण में मदद मिलती है, जिससे मृदा अपरदन में कमी आती है तथा क

• एक ही खर-पतवारनाशी के लगातार इस्तेमाल से खर-पतवार उस खर-पतवारनाशी के प्रति सहनशील हो जाते हैं या उन्हीं के बीच ऐसी प्रजाति विकसित हो जाती है, जो उस खर-पतवारनाशी के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। कोरिया में वार्षिक खर-पतवार जैसे Echinochloa crusgalli तथाMonochoria vaginalis, एवं सदाबहार जैसे Sagittaria trifolia, Sagittaria pygmaea, Eleocharis kuroguwai, Cyperus serotinus एवं Potamogeton distinctus, चावल के खेतों में उगने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण खर-पतवार प्रजातियां मानी जाती हैं। 

• अब सदाबहार खर-पतवार 19% (1971) से बढ़कर 54% (1981) तथा 60% (1990) तक जा पहुंचा है। E. kuroguwai तथा S. trifolia मौजूदा खर-पतवारनाशी के प्रति काफी सहनशील बन गए हैं, क्योंकि उनका उदय एक लंबी अवधि में हुआ है (किम, 1992).   

• लेटिन अमेरिकी चावल क्षेत्र में वंश Echinocloa में लगभग 50 प्रजातियां शामिल हैं, जिनमें उप-प्रजातियों के साथ ऐसी किस्में भी हैं जो प्रोपेनिल के प्रति प्रतिरोधक हैं। दुनियाभर में चावल से जुड़

• समेकित चावल तथा बत्तख खेती का प्रचलन वियतनाम में काफी अधिक हैम जहां बत्तख पालन को शामिल करने से मोनो-कोट खर-पतवार जैसे Echinochloa crusgalli तथा Monochoria vaginalis (फ्युरुनो, 2001) में काफी कमी आती है। चावल-मूंग बीन फ़सल पर अन्नामलाई विश्वविद्यालय में किए 3 वर्षों के अध्ययन में यह बात सामने आई कि मूंग बीन की रिले क्रॉप के इस्तेमाल से समस्या उत्पन्न करने वाले खर-पतवार Cyperus difformis (काथिरेसन, 2002) में कमी आयी। 

• अजोला जैसा जैव-उर्वरक़ जो एक फर्न है और मृदा में वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करता है, खेत के ठहरे जल के ऊपर इसके द्वारा निर्मित थैलस की मोटी चादर से खर-पतवार को धूप नहीं मिल पाती जिससे उनकी वृद्धि में कमी आती है। (कैथिरेसन तथा अन्य, 2001). 

• मछली तथा पॉल्ट्री घटक के समेकन से होने वाले दीर्घकालिक प्रभाव पर अन्नामलाई विश्वविद्यालय में 8 वर्षों तह किए अध्ययन में यह देखा गया कि मछली तथा प

• 90 के दशक में चावल के ऐलीलोपैथिक अनुसंधान खर-पतवार को दबाने वाली चावल किस्मों की जांच पर आधारित था साथ ही इस दौर में रासायनिक यौगिकों की पहचान पर भी ध्यान दिया गया। चावल में 15 देशों से 60 कृषि किस्में हैं, जिनके ज्ञात ऐली ऐलेलोपैथिक प्रभाव हैं तथा इनमें से कुछ किस्में एक निश्चित त्रिज्या के भीतर लगभग 90% की दर पर खर-पतवारों का नियंत्रण करती हैं।   

• जापान में, 189 चावल किस्में हैं, जिनमें (72) जापानी प्रकार, 18 इंडिका प्रकार, 32 जावानिका प्रकार, 29 चाइनीज प्रकार तथा4 अफ्रीकन प्रकारों का  ऐलेलोपैथिक प्रभाव के लिए मूल्यांकन किया गया। जैपोनिका प्रकार के चावल के उन्नत किस्में ऐलेलोपैथिक रूप से कम सक्रिय थीं। जावानिका चावल के कुछ मूल किस्मों तथा लाल चावल की किस्मों ने प्रबल प्रतिरोध सक्रियता दिखाई (FFTC टेक्निकल बुलेटिन 1993). 

• चंग इल्मिन तथा अन्य (1997) द्वारा किए एक अध

• जड़ निःश्रवण द्वारा या पौधे के सड़े-गले पदार्थों से पर्यावरण में विषैले पदार्थों की मुक्ती के जरिए खर-पतवारों की ऐलीलोपैथिक क्षमता का प्रदर्शन लगभग 90 प्रजातियों में किया गया (पत्नम 1986)।

• चावल का अंकुरण, वृद्धि तथा उपज  C. rotundus से उत्पन्न लीचैट्स द्वारा कम होता है तथा यह कमी ऐलेलोपैथिन की मौजूदगी के कारण उत्पन्न होती है।  Lantana camara, Cyperus rotundus, Ageratum conizoides, Echinochloa crusgalli, Commelina benghalensis तथा Xanthium strumanium के संपूर्ण वनस्पति निष्कर्षण के बीच (E. crusgalli तथा C. benghalensis को छोड़कर)  अन्य सभी चावल के बीज के अंकुरण को विलम्बित करते हैं। 

• गूज वीड(Sphenoclea zeylanica) से मिथेनॉल के निष्कर्षण के ऐलीलोपैथिक प्रभाव की जांच प्रेमास्तिरा तथा जुंगसोंटिपोर्न (1996) की गई, जिसमें उन्होंने बायो-ऐसेज विधियों का इस्तेमाल कर यह यह निष्कर्ष निकाला कि निष्कर्षण का फाइटोटॉक्सिक प्रभाव S. zeylanica की आयु के साथ बढ़ा। पुष्पण (बीज) से

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Sep

ऐलेलोपैथी प्रणाली

• निक्षालन, अवशिष्ट समावेशन तथा अपघटन, वाष्पीकरण, जड़ निःश्रवण इत्यादि द्वारा ऐलेलोपैथिक यौगिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राइजोइजोस्फेयर में मुक्त होते हैं। अनुसंधान से पता चलता है कि जब एक पौधे द्वारा निर्मित ऐलेलोकेमिकल पर्यावरण में मुक्त होता है तब जैव-रसायन की अंतःक्रिया होती है, तथा दूसरे पौधे की वृद्धि तथा विकास प्रभावित होता है।   

• जटिल होने के कारण ऐलेलोपैथिक परिघटना का प्रदर्शन कठिन होता है। प्रयोगशाला बायोऐसेज अहम होते हैं, क्योंकि वे कम समय में अनुसंधानकर्ताओं को बड़ी मात्रा में पौधे की सामग्रियों के अध्ययन की अनुमति देते हैं। ये अनुसंधानकर्ताओं को अध्ययन के तहत आने वाले कारकों के अलावा हस्तक्षेप कारकों को समाप्त करते हैं।  

• चावल की प्रजातियों की ऐलेलोपैथिक क्षमता खेती की पद्धतियां, मृदा के गुण तथा पर्यावरणीय दशाओं प

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एलेलोपैथी

पौधे पर्यावरण में कई तरीके से रसायन मुक्त करते हैं, जो एडाफिक तथा जलवायविक कारकों पर निर्भर करता है, जो पड़ोसी प्रजातियों की वृद्धि को प्रभावित करता है।  

इस परिघटना का इस्तेमाल निम्नांकित के जरिए पर्यावरण हितैषी (अरासायनिक) खर-पतवार प्रबंधन के लिए किया जा सकता है:  

(i) ऐलीलोपैथिक कवर क्रॉप 

(ii) प्राकृतिक खर-पतवारनाशी के रूप में ऐलीलोकेमिकल 

(iii) ऐलीलोपैथिक फ़सल प्रजातियां 

पुराने समय से कुछ कृषि फ़सल या विशेष पौधे, जैसे बकव्हीट, काला सरसों, सूर्यमुखी, काला अखरोट, अनाज की फ़सलें जैसे बाजरा, जौ, रागी तथा राई, खर-पतवार से मुकाबला करने के गुण से संपन्न पाए गए हैं।    

 

1. खर-पतवार नियंत्रण के उदासीन या जैविक एजेंट वे जैविक मूल के एजेंट होते हैं, जो वांछित पौधों को बिना प्रभावित किए खर-पतवारों को नष्ट करते हैं अथवा उन्हें बाधित करते हैं। ऐसे एजेंटों में शामिल हैं- कीट, जानवर, मछलियां (जैसे चाइनीज कार्प), घोंघे, पक्षी (जैसे बत्तख), रोगाणु (कवक, बैक्टीरिया, वायरस, नेमाटोड इत्यादि), उनके विषैले उत्पाद तथा पौधे (परपोषी पौधे, प्रतियोगी पौधे) या उनके उत्पाद।  

2. भारत तथा अन्य देशों में राइजी-पिसीकल्चर में देखा गया है कि शाकाहारी (मैक्रोफाइटोफेगस) तथा शैवालहारी (माइक्रोफाइटोफेगस) मछलियों को चावल के खेतों में खरपतवार एवं शैवाल के नियंत्रण में उपयोग किया जा सकता है। इस उद्देश्य के लिए प्रयुक्त मछलियां हैं एशिया में  Puntius javanicus, अफ्रीका में  Tilapia rendalli तथा T. zilli , जो शाकाहारी होती हैं, और एशिया में T. mossambica , जो शैवालहारी होती हैं। 

3.  भारत में गै

खर-पतवार नाशी के अनुप्रयोग का अर्थ होता है सही मात्रा में खर-पतवारनाशी का एक समान रूप से वितरण करना। 

    i)   दाबयुक्त अनुप्रयोग – हाइड्रॉलिक अनुप्रयोग (नैपसैक स्प्रेयर)

    ii)  गैर-दाबयुक्त अनुप्रयोग – ग्रेनुलर ऐप्लिकेटर, वाटर गन, डाइरेक्ट कॉन्टेक्ट ऐप्लिकेटर, कंट्रोल्ड-ड्रॉप्लेट ऐप्लिकेशन 

 

1. ऐसे क्षेत्रों में जहां वर्षा का अनुमान लगाना कठिन हो या  खर-पतवारनाशी वाष्पशील हो अथव तीव्र प्रकाश-अपघटन होने वाला हो वहां पौध-पूर्व के इस्तेमाल में रोपण से पहले मौजूदा वनस्पतियों पर पत्र छिड़काव किया जाता है या उन्हें मिट्टी में डाला जाता है।

2. पश्च-पौध इस्तेमाल में  a) रोपण के बाद मिट्टी में तथा फ़सल अथवा खर-पतवार के उगने से पहले (उदय पूर्व) डाला जाता है या  b) खर-पतवार या फ़सल के पौध में डाला जाता है, जो पत्र छिड़काव द्वारा या जल में मिलाकर (उदय पश्चात) डाला जाता है।  

3. इस्तेमाल के बाद या उसके दौरान खर-पतवारनाशियों की गतिविधि एक पर्यावरणीय चिंता होती है, इसका हमेशा ध्यान रखना चाहिए। जलीय या गैसीय अवस्था वाले खर-पतवारनाशियों के बहाव से पास के फ़सल पर होने वाले लक्षणों या उनके जख्मों को रोकने के लिए सही इस्तेमाल विधियों का प्रयोग करना चाहिए।  

 

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