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• चावल के उत्पादन में जल का इस्तेमाल खर-पतवार के विकास पर अहम प्रभाव डाल सकता है।   

• गीले बीज वाले चावल की तुलना में सूखे बीज वाले चावल की प्रजातियों तथा घनत्व में बीज की क्यारी के निर्माण में अंतर, अंकुरण के समय नमी तथा आरंभिक वृद्धि अवस्थाओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति तथा चावल के आरंभिक विकास चरण के कारण खर-पतवार की समस्या भिन्न होती है।  

• इसके अतिरिक्त  C3 प्रकाश-संश्लेषक उपकरण वाले पौधे जलमग्न चावल की खेती की स्थिति में अधिक पाए जाते हैं जबकि C4  प्रकाश-संश्लेषक उपकरण वाले पौधे सूखे चावल की खेती की स्थिति में अधिक पाए जाते हैं । 

• चावल एक C3 प्रकार का पौधा है तथा  C3 खर-पतवारों के समान ही उसकी भी सीमाएं होती है; जबकि  C4 पौधों में उच्च प्रकाश-संश्लेषण सक्रियता होती है, उच्च प्रकाश, आदर्श तापमान तथा नमी की निम्न मात्रा होती है। 

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• उर्वरकों तथा खादों को मिट्टी के अंदर 5-10 सेमी गहरे डालना चाहिए, ताकि भूमि सतह पर मौजूद खर-पतवारों के नन्हे पौधों के लिए वे उपलब्ध न हो पाए। उच्चभूमि या अजलमग्न चावल खेती में जीवों के सड़ना तथा हरे खाद वाले पौधे को चावल के पौधे के लिए भूमि तैयारी में शामिल किया जाना इतना अहम नहीं होता जितना जलमग्नता वाली स्थिति में चावल की खेती के लिए होता है।    

• जल निमग्न समेत अधिकतर खर-पतवार जलमग्नता की स्थिति में या भूमि की सतह पर नाइट्रोजन उर्वरक डालने से काफी तेजी से वृद्धि करते हैं। फॉस्फेट उर्वरकों को मिट्टी की सतह पर डालने से खलिहान में उगने वाली घास तथा शैवाल भी उगते हैं। चावल की फ़सल से पहले उर्वरकों का इस्तेमाल काफी आम बात है, जिससे खर-पतवारों की तीव्र वृद्धि होती है।    

• अत्यधिक मात्रा में उर्वरक डाले जाने से भी खर-पतवारों की वृद्धि बढ़ती है, और ज्योंह

• चावल के रोपण से पहले चावल के बीजों की क्यारियों की अच्छी तरह से जुताई की जानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक खर-पतवारों के जड़ों तथा अंकुरित हो रहे खर-पतवारों का नाश हो सके। 

• हालांकि यांत्रिक जुताई द्वारा की गई भूमि तैयारी यदि सूखी मिट्टी में की जाती है तो खर-पतवार के नियंत्रण में इसका कोई खास असर नहीं पड़ता क्योंकि अधिकतर बीज निम्न नमी की स्थिति में उगते हैं।

• यदि मिट्टी की जुताई यदि सही तरह से नहीं का जाती है, तो खर-पतवार को बढ़ावा देने वाले बिचड़े भी उग आते हैं या मिट्टी ढीली होने के कारण उनके गहरे दबने से फ़सल की बाद की वृद्धि अवस्था के लिए काफी समस्या पैदा हो सकती है। 

• बीजों के मिट्टी में गहरे धंसने से जमीन के भीतर बीजों के चारों ओर ऑक्सीजन की कमी पैदा हो सकती है/या कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य गैसों का अधिक निर्माण हो सकता है और बीज अपने द्वितीय निष

• पौधे की अच्छी किस्मों के चयन से जैविक उपज में वृद्धि होती है तथा इससे दाने भी पुष्ट होते हैं। वर्षा पूरित उच्च भूमि के चावल की उपज वाले क्षेत्रों में दानों की उच्च उपज की संभावना के अलावा खर-पतवार से प्रतियोगिता करने की उच्च क्षमता वाली किस्में अहम होती हैं।   

• CRRI, कटक में किए अनुसंधान में यह पाया गया कि वंदना, अंजली तथा कलिंग  ш जैसी किस्मों में खर-पतवारों से मुकाबला करने के गुण मौजूद होते हैं और इनकी उपज, वर्षा पूरित उच्च-भूमि की पारंपरिक किस्मों की तुलना में 42-63% अधिक होती है। 

• इसी तरह छिछली से निम्न भूमि में मोती, गायत्री, सावित्री तथा गहरे जल में दुर्गा काभी प्रभावी (पारंपरिक किस्मों की तुलना में 48-69% उपज लाभ) माना गया।  

• सोनिया, NCS 132, NCS 134, AUS 257, AUS 196 तथा अग्नीसाल एवं नरेंद्र 97 जैसे जीनोटाइप को खर-पतवारों से बेहतर तरीके से मुकाबला करने वाले देखे गए

• भारत तथा विदेशों में किए अध्ययन में यह पता चला है कि  Sesbania bispinosa का गीले बीज वाले चावल के साथ एक अंतरफ़सल के रूप में उपयोग कर खर-पतवार का नियंत्रण किया जा सकता है। 

• चावल+चवली तथा चावल+मूंग के अंतरफ़सल प्रणाली में  खर-पतवार का घनत्व तथा खर-पतवारों का शुष्क भार चावल की अकेली खेती वाली प्रणाली जितना ही कम पाया गया।  निरंतर चावल मोनो-कल्चर के कारण खर-पतवार के घनत्व में वृद्धि होती है, जो गीली दशा में वृद्धि के लिए अनुकूलित होते हैं।

• गीली भूमि के चक्र की बजाए शुष्क भूमि फ़सल के प्रयोग से खर-पतवार के विकास में कमी आती है। दूसरे चावल-चावल क्रमिक फ़सलीकरण प्रणाली में Echinochloa crusgalli के समूह की संख्या घटाई जा सकती है। 

• चावल की खेती में खर-पतवार के बेहतर नियंत्रण से गैर-टिलेज प्रणाली की तुलना में अगली सोयाबीन फ़सल में उनकी कमी पर अच्छा असर पड़ता है। 

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• सावधानीपूर्वक रूप से किया फ़सल चक्रण चावल के खर-पतवारों के नियंत्रण की एक काफी प्रभावी पारंपरिक तकनीक माना जाती है तथा जब भी संभव हो इसका इस्तेमाल करना चाहिए। 

• कई बार खर-पतवार विशेष फ़सल से जुड़े होते हैं, क्योंकि उननी वृद्धि जरूरत/गुण फ़सल जैसे ही होते हैं। क्योंकि खर-पतवार अपनी वृद्धि आदतें तथा जीवन चक्र में भिन्नता प्रदर्शित करते हैं, इसलिए अलग प्रकार के फ़सल चक्रण तथा पारंपरिक आवश्यकता के चुनाव से हम प्रभावी खर-पतवार के विकास को बाधित कर सकते हैं।

खर-पतवार के नियंत्रण की पारंपरिक विधियों में शामिल हैं:  

1.  फ़सल चक्रण 

2.  अंतरफसल प्रणाली 

3.  किस्मों या जीनोटाइप का चुनाव 

4.  बीजों की क्यारियों की तैयारी 

5.  उर्वरक प्रबंधन 

6.  जल प्रबंधन 

 

1.  गीली भूमि की चावल खेती में प्रत्यक्ष खर-पतवार 

नियंत्रण विधि में निम्न शामिल हैं: हाथ से निराई-गुराई, यांत्रिक निराई-गुड़ाई, छिड़काव अत्था जैविक नियंत्रण।  

2.  हाथ से निराई-गुड़ाई में लगभग 120 घंटे/हेक्टेयर, यांत्रिक निराई-गुड़ाई में लगभग 50-70 घंटे/हेक्टेयर एवं छिड़काव में 4 घंटे प्रति हेक्टेयर लगते हैं। 

 

• सावधानीपूर्वक किया गया फ़सल चक्रण  खर-पतवार के नियंत्रण की काफी प्रभावी पारंपरिक तकनीक है। कई बार  खर-पतवार विशेष फ़सल से जुड़े होते हैं, क्योंकि उननी वृद्धि जरूरत/गुण फ़सल जैसे ही होते हैं। क्योंकि खर-पतवार अपनी वृद्धि आदतें तथा जीवन चक्र में भिन्नता प्रदर्शित करते हैं, इसलिए अलग प्रकार के फ़सल चक्रण तथा पारंपरिक आवश्यकता के चुनाव से हम प्रभावी खर-पतवार के विकास को बाधित कर सकते हैं।      

• फ़सल तथा खर-पतवार नियंत्रण के उपायों को लंबे समय के फ़सल चक्रण कार्यक्रम में बदलना चाहिए। यदि समान फ़सल तथा खर-पतवार नियंत्रण कार्य का हर साल उपयोग किया जाए तो संपूर्ण चक्रण प्रणाली से जुड़े खर-पतवार इतने गंभीर हो जाएंगे जितने कि वे मोनोकल्चर प्रणाली में होते हैं।    

• भारत तथा विदेशों में किए अध्ययन में यह पता चला है कि  Sesbania bispinosa का गीले बीज वाले चाव

1. बंजर भूमि प्रबंधन खर-पतवार नियंत्रण का 

एक अहम विकल्प है, जिसमें परिवर्तनशील कारकों, जैसे वातन प्रणाली, जलमग्नता से एरोबिक तथा/या परती अवधि के दौरान खर-पतवार द्वारा बीजों के निर्माण को रोकना आदि शामिल है। 

2. वातन को बदलकर एक मौसम से दूसरे में खर-पतवारों की प्रजातियों में बदलाव लाना। 

3. खर-पतवारों के समूहों में ऐसे परिवर्तनों से किसी ऐसे प्रभावी प्रजाति के खर-पतवारों के निर्माण में बाधा आती है, जो वृद्धिरत दशाओं के लिए अनुकूल होती है।  

4. परती में जुताई कर तथा/या खेत में आग लगाकर खर-पतवारों में कमी की जा सकती है, क्योंकि ऐसे में उनके बीज मिट्टी में जम नहीं पाते। 

5. हालांकि खेतों में आग लगाने की सलाह नहीं दी जाती है, क्योंकि यह मिट्टी के जैविक पदार्थों को नष्ट करता है और मिट्टी की सतह पर आए कुछ फ़सल बीज मर जाते हैं।

 

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