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1. यह गीली चावल भूमि का खर-पतवार है, सामान्यतः यह नदी किनारे तथा बांध में मिलता है।
1. यह बीजों तथा मूलयुक्त तने द्वारा अपना प्रसार करता है।
1. एक लत्तर, बहुवार्षिक शाक, तना से जड़-विकास। तना अधिक शाखित, रोमिल या ग्लैबरस; पत्तियां अपोजिट क्युनिएट-ओबोवेट, नीचे कुछ संपीडित रोम के साथ सेरेट ऑब्टूज। 2. वृंत छोटा। पेडंक्यूल्स 6 – 7 मिमी लंबा। सिर 3 – 6 मिमी व्यास। अंततः दीर्घीकृत 7 – 12 मिमी। ब्रैक्ट्स ओबोवेट या सब-ओर्बिक्युलर, लघु ऐक्युमिनेट। 3. कैलिक्स 2-फिड, लघु प्युबेसेंट। कोरोला 2.5 मिमी लंबा, सब-2 लिप युक्त, 5 छोटे लोब वाले, निम्नतम, बड़े, ऊपर वाले 2 सबसे छोटे। 4. वर्तिका छोटी, वर्तिकाग्र ऑब्लिक। फल 2 मिमी व्यास, दो फिड युक्त कैलिक्स तथा ब्रैक्ट्स। इसमें फूल तथा फल पूरे वर्ष भर लगते हैं।
लिप्पिया नोडीफ्लोरा - Lippia nodiflora जीवन रूप - बहुवार्षिक

• जमीन की तैयारी चावल की वृद्धि तथा विकास के लिए 

एक अनुकूल दशा प्रदान करती है, साथ ही यह रोपण के समय खर-पतवार से मुक्ति भी दिलाती है। सही तरीके से भूमि की तैयारी करने से उसके बाद होने वाले खर-पतवार के विकास में कमी आती है इससे और चावल के पौधे को स्थापित होने में मदद मिलती है व खर-पतवारों के उगने से पहले संसाधनों के उपयोग में दक्षता आती है।     

• मॉनसून से पूर्व शुष्क जुताई से बारहमासी खर-पतवारों के वर्धी अंगों के विनाश में मदद मिलती है, बशर्ते कि पौधे के वे अहम हिस्से धूल में हों और वे सूखे रहें। गहरी जुताई, जहां मिट्टी पूरी तरह से पलट दी जाती है, खर-पतवार के बीज जमीन में काफी अंदर दब जाते हैं और उनका अंकुरण रुक जाता है। 

• जलजमाव के बाद खेत में दो बार कीचड़ तैयार कर खेत को समतल करने से खर-पतवार की वृद्धि तथा अंकुरण रुक जाते हैं। 

 

• अच्छी गुणवत्ता वाले तथा खर-पतवार रहित चावल के दाने के प्रयोग से खर-पतवार के प्रसार को रोकने में मदद मिलती है। खेती के उद्देश्य से चावल के एक महादेश से दूसरे में खरीदे जाने के क्रम में भी खर-पतवार का प्रसार होता है।   

• यदि चावल के बीज में खर-पतवारों के बीज शामिल हों या उपकरणों में उनके बीच फंस जाएं अथवा सिंचाई वाले जल के साथ वे एक खेत से दूसरे में पहुंच जाएं, तो एक किसान से दूसरे तथा एक खेत से दूसरे में खर-पतवारों का अधिक स्थानीय रूप से प्रसार होता है। 

• प्रायः खर-पतवार के बीज अपने रूप-रंग में मुख्य फ़सल के बीज से मेल खाते दिखते हैं, जिससे वे चावल के बीज में शामिल हो जाते हैं और उनका प्रसार हो जाता है। जो खर-पतवार फ़सल से पहले पकते हैं वे फसल के साथ पकने वाले खर-पतवारों की तुलना में कम प्रसार करते हैं तथा वे अधिकतर स्थानीय रूप में ही देखे जाते हैं।  

• हस्त चालित या बिजली चालित वीडर का उपयोग किया जाता है। यह केवल तभी संभव होता है, जब चावल सीधी कतार में बोया जाता है। हैंड वीडर जैसे रोटरी तथा कोनो तब प्रभावी नहीं रहते जब भूमि काफी सूखी रहती है या ठहरे पाने में डूबी होती है। 

• ठेल कर चलाने वाले वीडर का काफी उपयोग किया जाता है। वीडर एक-दूसरे के समकोण पर दोनों ही दिशाओं में दौड़ाया जाना चाहिए।  

 

• खर-पतवारों को गहरी खुदाई कर बाहर निकाल दिया जाता है, ताकि जमीन के अंदर रहने वाले उनके भंडारण अंग बाहर निकल जाएं। यह विधि Cynodon dactylon जैसे बारहमासी  खर-पतवार के लिए काफी उपयोगी माना जाता है। 

 

• खर-पतवारों को जमीन की सतह से ऊपर से काट दिया जाता है तथा भारी चेनों की मदद से उनकी जड़ों और राइजोम की ड्रेजिंग और चेनिंग की जाती है। 

• जल-जमाव:  बारहमासी खर-पतवार  जैसे Cyperus rotundas, Cynodon dactylon की स्थिति में प्रभावी विधि है।  खर-पतवार वाले खेत में गहरी जुताई की जाती है और फिर 2-4 हफ्ते के लिए 30 सेमी तक पानी से भर दिया जाता है।

 

• हैंड हो के जरिए सतह की संपूर्ण मिट्टी को छिछली गहराई तक खोदी जाती है, जिसमें खर-पतवार उखड़ जाते हैं तथा वे हट जाते हैं। इसके बाद खेत को सूखने के लिए छोड़ना चाहिए ताकि उखड़े हुए बीज हल्की सिंचाई के पश्चात फिर से न उग पाए। भले ही यह कीमती होता है, पर काफी उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह मिट्टी की भौतिक दशा को सुधारता है और साथ ही खर-पतवार का नाशन हो होता ही है। समय-समय पर जुताई कर कठिन खर-पतवारों पर नियंत्रण पाया जाता है। 

 

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