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24
Aug

रासायनिक समूह के आधार पर

रासायनिक समूह के आधार पर

  • एलिफैटिक्स
  • एमिड्स और एसिटामिड्स: जैसे ऐलेक्लोर और बुचैलर
  • आर्सेनिकल्स
  • बेंज़ोइक्स और फ़िनाइल एसिटेट्स
  • बाइपिरिडिलिमस
  • कार्बामेट्स और कार्बानिलेट्स
  • डाइनाइट्रोएनिलाइन्स: जैसे ओर्ज़ेलिन, पेन्डिमिथेलिन, ट्रिफ्लुएरिन
  • डाइफिनाइल ईथर: जैसे नाइट्रोफ़ेन, ऑक्सीफ्लोरफ़ेन
  • नाइट्राइल्स
  • फ़ीनोल्स
  • फ़ीनोक्सीएसिड्स: जैसे 2,4-डी
  • पिरिडैज़िनोम्स
  • थायोकार्बेमेट: जैसे बेंथियोकार्ब
  • ट्राइयेज़ाइन्स
  • ट्राइयेज़ोल्स
  • यूरेसिल्स
  • यूरिया
24
Aug

शाकनाशियों का वर्गीकरण

शाकनाशियों का वर्गीकरण

I. छिड़काव के समय के आधार पर:

पौध लगाने से पहले: इस विधि में शाकनाशियों का छिड़काव फसल लगाने से पहले किया जाता है। बढ़ते पौधों पर तेज असर वाला शाकनाशी फसल लगाने से पहले छिड़का जाता है।

अंकुरण से पहले: फसल या खरपतवार के उगने से पहले शाकनाशियों का छिड़काव किया जाता है।

अंकुरण के बाद: फसल या खरपतवार के उगने के बाद शाकनाशियों का छिड़काव किया जाता है

II. कार्य करने के तरीके के आधार पर:

सर्वांगी या ट्रांसलोकेटेड शाकनाशी: वे शाकनाशी जो फैलकर पूरे पादप तंत्र पर असर डालते हैं और छिड़काव के स्थान से दूर जाकर गतिविधि करते हैं

संपर्क शाकनाशी: यह शाकनाशी पादप के उस हिस्से को खत्म कर देता है जो इसके संपर्क में आता है। छिड़काव के स्थान से बहुत कम फैलाव

III. चयनात्मकता के आधार पर:

1. चयनात्मक शाकनाशी: मिश्रित पादप समूहों (फसल और खरपतवार) क

रासायनिक विधियों से खरपतवार नियंत्रण

शाकनाशी: वे रसायन जो अन्य पौधों (फसलों) को बड़ा नुकसान पहुंचाए बिना कुछ पौधों (खरपतवार) को नष्ट कर सकते हैं।

शाकनाशी गतिविधियां: यदि शाकनाशी उस पौधे के अंकुरण और उसकी विकास प्रक्रिया में बाधा डाल पाता है, उसे रोक पाता है या उससे बचाव कर पाता है तो उसे सक्रिय शाकनाशी कहा जाता है।

शाकनाशी चयनात्मकता: इसका संबंध उस अवधारणा से है जिसमें एक रसायन मिश्रित पादप समूह में लक्षित पादप की प्रजाति को तो समाप्त कर देता है लेकिन अन्य पौधों पर उसका कोई असर नहीं या मामूली असर होता है। शाकनाशी चयनात्मकता ही एकमात्र प्रभावी घटक है जो फसलों में रासायनिक खरपतवार नियंत्रक विधि को सफल बनाता है।

शाकनाशी के लाभ:

  • प्री इमरजेंट (पूर्व आपातिक) शाकनाशियों से सीज़न की शुरुआत में ही खरपतवार नियंत्रण में आ जाता है। यह काफ़ी लाभकारी है क्य

खरपतवार नियंत्रण की प्रत्यक्ष विधियां

1. हाथों से खरपतवार निकालना:: हाथों से खींच कर उखाड़ना या कुदाल, फावड़े या हँसिया से उन्हें निकालना, प्रतिरोपण के 20 से 42 दिनों के बीच एक या दो बार इस विधि से खरपतवार निकालें

फायदे: सबसे प्रचलित विधि, आसान और प्रभावी। जहां रैन्डम रोपण किया गया है, वहां भी यह विधि आसानी से अपनाई जा सकती है

सीमाएं : महंगी है और ज़्यादा मेहनत लगती है।

2. मशीनों से खरपतवार हटाना: रोटेरी वीडर से: हाथों से धकेला जाता है और सीधी पंक्तियों में चलाया जाता है

फायदे : मेहनत बचती है

सीमाएं : इसके लिए पंक्तियों में रोपण और प्रतिरोपण करना ज़रूरी है

24
Aug

कीट नियंत्रण के पूरक उपाय

कीट नियंत्रण के पूरक उपाय

जमीन तैयार करना: प्रतिरोपण से पहले गारा बनाने और खरपतवार हटाने से चावल की फसल को खरपतवार की तुलना में अच्छी शुरुआत मिल जाती है।

खरपतवारमुक्त बीज और पौध का उपयोग करना

रोपण विधियां:

सीधी-पंक्ति में रोपण: हाथों और मशीनी उपकरण से खरपतवार को हटाना आसान

रैन्डम रोपण : खरपतवार हटाने और मशीनी उपकरण के इस्तेमाल में कठिनाई  

प्रतिरोपण: खरपतवार से स्पर्धा कम

सीधे बीज रोपण: खरपतवार से स्पर्धा बहुत अधिक

प्रजातियां:

लंबी बढ़ने वाली पारंपरिक प्रजातियां: खरपतवार से ज़्यादा मुकाबला करती हैं

आधुनिक, थोड़ी छोटी प्रजातियां : खरपतवार की समस्या अधिक

पौधों के बीच जगह और सघनता 

कम जगह: खरपतवार से प्रतिस्पर्धा को कम करती है

उच्च सघनता: खरपतवार से प्रतिस्पर्धा को कम करती है

उर्वरक डालना:  

खरपतवार हटाने के बाद उ

कीट नियंत्रण की निरोधात्मक विधियां

इनमें कीटों के पनपने और उनके बीजों के फैलाव पर नियंत्रण किया जाता है।

  • आसान और सस्ती
  • निरोधक उपायों में कीटमुक्त बीजों; कीटमुक्त खेतों, कीटमुक्त अच्छी तरह डीकम्पोज़ की गई एफवाईएम, साफ औजारों तथा मशीनरी और स्वच्छ सिंचाई नहरों का उपयोग।
24
Aug

Methods of weed control

Methods of weed control

खरपतवार नियंत्रण की विधियां दो प्रकार की हैं

I. निरोधक विधियां

II. पूरक उपाय

III. खरपतवार नियंत्रण के प्रत्यक्ष उपाय

साइपेरस रोटुन्डस एल. (बैंगनी नट सेज)

कुल: साइपरेसी

विवरण:

  • संसार के सबसे बुरे खरपतवार में से एक।
  • ऊंचाई -15-60 सेमी.  
  • यह पौधा आधार में फूलकर मोटा होता है। इसका पुष्पदंड चिकना होता है, 10 से 60 सेमी लंबा होता है, 30 सेमी लंबी और 8 मिमी चौड़ी घासनुमा पत्तियों के आधार क्लस्टर के केंद्र से निकलता है।  
  • पत्तियां चिकनी, गहरी हरी होती हैं और ऊपरी सतह पर खांचा बनाती हैं।  
  • कुछ नगण्य भूमिगत फैलने वाले तने के आधार से निकलते हैं और काले, अनियमित आकारों या गोल कंदों की शृंखला बनाते हैं जिनकी लंबाई 2 सेमी होती है। कंद अंकुर अपने जनक पादप से जुड़े हुए ही नए पौधे तैयार कर लेते हैं।  
  • तने के शीर्ष पर फूल लगते हैं। उसमें अनेक पतली शाखाएं होती हैं जिनके शीर्ष पर भूरे से गहरे रंग के स्पाइक के क्लस्टर रहते हैं। प्रत्येक स्पाइक में 10 से 30 छोटे सघन फ्लोरेट होते हैं जो परिप
24
Aug

साइपेरस आयरिया एल. - Cyperus iria L

साइपेरस आयरिया एल.

कुल: साइपरैसी (Cyperaceae )

विवरण:

  • चावल के खेतों में व्यापक रूप से पायी जाने वाली प्रजाति
  • तना 15 से 50 सेमी लंबा, तिकोना होता है

मोनोकॉरिया वेजिनेलिस

कुल: पॉन्टेडेरीसी (Pontederiaceae)

विवरण:  

  • रूट स्टॉक छोटा और उप तना खड़ा
  • पत्तियां सीधी या थोड़ी अंडाकार, हृदयाकार आधार के साथ 5 से 15 सेमी लंबी
  • प्रजनन – बीज और रूट स्टॉक से।
  • नम स्थानों में खूब पनपती है
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