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22
Aug

1. घुमावदार पैटर्न

1. घुमावदार पैटर्न

  • घुमावदार पैटर्न में मशीन खेत की सीमा के साथ से अपना काम शुरू करती है।
  • यह खेत की अन्य सीमाओं के साथ काम करते हुए वापस अपने प्रारंभिक बिंदु पर आ जाती है।
  • यह पैटर्न भूमि के बाहर से उसके केंद्र की तरफ काम करता है और जुताई में अधिकतर इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है।
  • इसे आमतौर पर मोल्ड बोर्ड, डिस्क और ऑफसेट डिस्क के साथ प्रयोग किया जाता है।
  • यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें काम करने के अधिकतर पशु आदी होते हैं और इसमें ऑपरेटर के स्थान संबंधी निर्णय की आवश्यकता कम होती है।
  • इस प्रणाली का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि खेत केंद्र में एक बहुत बड़ा कुंड सा बन जाता है।
  • समय के साथ-साथ भूमि के बीच में एक आयताकार तश्तरी के आकार का गढ्ढा बन जाता है जिसमें से पानी को निकालना कठिन होता है और बुवाई के लिए समान गहराई, खरपतवार और पानी का बेहतर नियंत्रण प्र
22
Aug

जुताई के पैटर्न

जुताई के पैटर्न

1. एक अच्छी तरह से किया गया जुताई का पैटर्न गैर उत्पादक कामों में लगने वाले समय को कम कर देता है।

2. किसी जुताई के पैटर्न के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों में से एक है जुताई करने के दौरान आने वाले घुमावों की संख्या को कम करना और जुताई के चक्करों की लंबाई को अधिकतम करना।

3. कई प्रकार के पैटर्न हैं जिनका उपयोग किसी खेत की जुताई करते समय किया जा सकता है। ये हैं

                1. घुमावदार पैटर्न

                2. ऊपर और नीचे या हेडलैंड पैटर्न:

                3. भूमि प्रणाली पैटर्न:

22
Aug

जुताई का वर्गीकरण और प्रकार

जुताई का वर्गीकरण और प्रकार

जुताई को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है:
i) प्राथमिक जुताई,

ii) माध्यमिक जुताई

I). प्राथमिक जुताई

इसमें मिट्टी का प्रमुख प्रारंभिक कार्य शामिल है। इसे सामान्य तौर पर मिट्टी की ताकत को कम करने, पौधों को ढकने और मिट्टी के अन्य तत्वों को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। फसलें उगाने के लिए बुवाई के लिए भूमि (सीड बेड) तैयार करने के लिए किसी भी कृषि योग्य भूमि को खोलने के लिए किए गए कार्यों को प्राथमिक जुताई कहा जाता है।

प्राथमिक जुताई के उपकरणः ये उपकरण ट्रैक्टर या पशुओं की सहायता से चलाए जाने वाले हो सकते हैं।

क).पशुओं द्वारा चलाए जाने वाले उपकरण: इसमें अधिकतर स्वदेशी हल और मोल्ड बोर्ड हल शामिल होते हैं।

ख).ट्रैक्टर द्वारा चलाए जाने वाले उपकरण: इसमें मोल्ड बोर्ड हल, डिस्क वाले हल, अवभूमि हल, छेनी हल

22
Aug

जुताई

जुताई

यह फसल उत्पादन के लिए अनुकूल स्थिति प्रदान करने के लिए यंत्रों की सहायता से की जाने वाली क्रिया है। मृदा जुताई में एक निश्चित गहराई तक मिट्टी की दृढ़ सतह को तोड़ना और मिट्टी को ढीला करना शामिल है ताकि फसलों की जड़ें मिट्टी में घुसने और फैलने में सक्षम हो सकें। इसके उद्देश्यों में शामिल हैं –

  • बोने योग्य गहरा खेत( सीड बेड) प्राप्त करना, जो विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त हो।
  • भूमि पर उगी वनस्पति को ढककर मिट्टी में अधिक ह्यूमस और उर्वरकता प्रदान करना।
  • खरपतवारों को नष्ट करना और उन्हें रोकना । फसलों के समुचित विकास के लिए मिट्टी को हवादार बनाना ।
  • मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता में वृद्धि करना।
  • कीड़ों, कीटों और उनके प्रजनन स्थानों को नष्ट करना।
  • मृदा कटाव को कम करना।
22
Aug

भूमि की तैयारी

भूमि की तैयारी

भूमि को समतल करने से भूमि की गुणवत्ता में स्थायी सुधार होने की अपेक्षा होती है। भूमि को समतल करने का काम भूमि के मौजूदा स्वरूप को संशोधित करने के लिए किया जाता है ताकि कुशल कृषि उत्पादन प्रणाली के वांछित कुछ उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। इन उद्देश्यों में शामिल हैं:

(i) सिंचाई के पानी को कुशलता से प्रयोग में लाना,

(ii) सतह जल की निकासी में सुधार,

(iii) मिट्टी का न्यूनतम कटाव

(iv) बारिश के पानी का अधिक संरक्षण विशेष रूप से सूखी भूमियों में और

(v) मशीनों के कुशलतम उपयोग के लिए खेत के पर्याप्त आकार और समतल भूमि का प्रावधान करना । पशु की सहायता से चलाया जाने वाला लैवलर एक लकड़ी के तख्ते से बना होता है जिसमें एक हैंडल लगा होता है। मिट्टी की स्थिति के आधार पर बोर्ड का आकार बदला जाता है। तख्ते के सामने वाले भाग में दो हुक लगे होते हैं जिनकी सहायता स

 उत्तर प्रदेश , भारत के व्यापक मिट्टी समूह और मिट्टी वर्गीकरण के सातवें अनुमानीकरण के उनके समकक्ष

उत्तर प्रदेश की चावल उगाने वाली मिट्टियां

  • राज्य में सात अलग-अलग तरह की मिट्टियों की पहचान की गई है जो कि अच्छी तरह से परिभाषित हैं और अपनी भूवैज्ञानिक संरचनाओं और मृदा जनित लक्षणों में एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
  • राज्य की मुख्य जोनल और एजोनल मिट्टी संरचनाओं का विकास इन व्यापक मिट्टी समूहों के भीतर हुआ है।
  • ये सभी मिट्टी समूह मिट्टी निर्माण के विभिन्न कारकों की विस्तृत श्रृंखला के संयुक्त प्रभाव के अंतर्गत विकसित हुए हैं जैसे जलवायु, वनस्पति, और मुख्य सामग्री ।
  • फसल अनुकूलनशीलता, उर्वरता और प्रबंधन के तरीकों के संबंध में ये विशिष्ट रूप से भिन्न कृषि स्थितियों को दर्शाते हैं।
  • वृहत और सूक्ष्म रूपों ने बदलाव और मृदा जनित कारकों के प्रभाव से इन क्षेत्रों में कई मिट्टी संघों के विकास में योगदान दिया है।
22
Aug

चावल उगाने के मौसम - Rice growing seasons

चावल उगाने के मौसम

  • उत्तरप्रदेश में चावल उगाने के दो मौसम हैं

                         1. खरीफ

                          2. गर्मी

  • खरीफ उत्तर प्रदेश में चावल की फसल उगाने का प्रमुख मौसम है। इस मौसम के दौरान जून - जुलाई में चावल बोया जाता है और नवंबर - दिसंबर में काटा जाता है। सर्दियों में कटाई होने के कारण खरीफ चावल को सर्दियों का चावल भी कहा जाता है ।
  • उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों जैसे पीलीभीत, बिलासपुर, बिजनौर में चावल को गर्मियों के चावल के रूप में उगाया जाता है जिसमें नर्सरी को नवंबर के महीने में बोया जाता है और 60-65 दिन के पौधों को खेत में रोपित किया जाता है। इसकी कटाई अप्रैल-मई में की जाती है।

 वायुसंचारित (एरोबिक) धान की खेती से लाभ

पारम्परिक मचाई, पानी भरी एंव अवायुसंचारित दशा में की जाने वाली खेती के सापेक्ष वायु संचारित धान की खेती से बहुत सारे लाभ परिलक्षित होते है। जैसे ---
o    खेती की मचाई एंव लगातार परनी भरे रहने की आवश्यक्ता नहीं की होती है।
o    सीधी बुवाई की जाती है।
o    नर्सरी एंव रोपाई की आवस्यक्ता नहीं।
o    बीज की कम मात्रा
o    श्रम की बचत
o    60% तक सिंचाई जल की बचत
o    उर्वरक उपयोग क्षमता में वृद्धि
o    कीट एंव बीमारियों की वजय प्रकोप पर्यावरण को हानि पहुचांने वाली मीथेन गैस की कम
o    मजबूत जड़ तन्त्र विकास कारण फसल गिरावट में कमी
o    भूमि की भौतिक दशा में सुधार
 

01
Jul

वायु संचारित चावल की खेती

वायु संचारित चावल की खेती :-

  • चावल भारतवासियों के जीवन यापन की एक महत्वपूर्ण फसल है। यह न केवल खाद्य सुरक्षा का मजबूत स्तम्भ है अपितु धार्मिक एंव संस्कृतिक रूप से भी जनमानस से जुडी है।
  • सतत्‌ रूप से बढ़ती जनसंख्या के भरण पोषण के लिए वर्तमान स्तर  9 करोड टन उत्पादन को सन्‌2020 तक 11-5 करोड टन के लक्ष्य तक पहुचांना होगा।
  • उक्त लक्ष्य को हमें भूमि की घटती उर्वराशक्ति, बढते उत्पादन, अवयवों की कीमत एंव श्रमिकों की घटती उपलब्धता आदि परिस्थितियों में बढना होगा।
  • धान का उत्पादन विभिन्न पारिस्थितिकीय तन्त्र में लिया जाता है। लेकिन आज भी प्रमुखता से इसको पानी से भरी भूमियों में रोपाई द्वारा पैदा किया जाता है।
  • देश में बढते औद्योगिकीकरण के कारण गांवों से श्रमिकों के शहर की ओर पलायन मनरेगा योजना में बडी मात्रा में श्रमिको के समायोजन से धान की खे
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