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उ.प्र एंव उत्तराखण्ड में बासमती एंव सुगन्धित धान की प्रजातियों की गुणवत्ता एंव उपज वृद्धि में सहयक प्रभावी बिन्दू:

चन्द्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, एवं सोसायटी फॉर मैनेजमेंट आफ एग्र्री-रूरल प्रोजेक्ट्‌स, कानपुर द्वारा गत 08 वर्ष से बासमती एंव सुगन्धित धान पर अध्ययत किया जा रहा है। उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकला गया है कि धान उत्पादकों को अच्छी गुणवत्ता की उपज प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तथ्यों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है:-

  • जिस भूमि में पानी खडा करने की क्षमता अधिक हो वह भूमि धान की खेती के लिए उत्तम होती है। इसके लिए 6-8-5 पी0एच0 मानक वाली मृदा अच्छी होती है।
  • धान की अच्छी उपज के लिए उच्च तापमान, नमी, लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी एंव पानी की प्रचुर उपलब्धता होनी चाहिए।
  • धान की फसल के लिए 30-37 डिग्री तापमान अच्छा रहता है। बासम
01
Jul

उन्नत पूसा बासमती-1(पूसा 1460)

उन्नत पूसा बासमती-1(पूसा 1460):

  • पूसा बासमती में अणुविक चिन्हव विधि द्वारा जीवाणु जनित कुलासा रोग रोधी जीन समायोजन के द्वारा तैयार की गयी इस प्रजाति का विमोचन 2007 में उन्नत पूसा बासमती-1 के नाम से किया गया।
  • यह 140 से 145 दिन में पककर तैयार होती है।
  • तथा इसकी उपज 45-50 कु/हे है
01
Jul

बासमती-386, पूसा बासमती-1

बासमती-386:

  • पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित 160 से 170 सेमी0 औसत कद वाली यह प्रजाति लगभग 155 दिन मे पक जाती है इसके चावल लम्बे, पतले व खुशबूदार एवं उच्च गुणवत्ता वाले होते है इसकह औसत उपज 20 से 25 कु0/हे0 है।

 
 पूसा बासमती-1 :

  • वर्ष 1989 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा विकसित इस अर्ध बौनी प्रजाति ने बासमती चावल निर्यात में एक क्रांति लायी।
  • यह प्रकाश अवधि अप्रभावित, सींकुर युक्त बालियों वाली, अधिक लम्बे सुगन्धित एवं स्वादिष्ट दानों की लगभग 130-135 दिनों में पककर तैयार होने वाली प्रजाति है।
  • इसकी उत्पादन क्षमता 40-50 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।
  • यह प्रजाति आज भी लोकप्रिय है।
01
Jul

तरावड़ी बासमती

तरावड़ी बासमती :

  • आज भी राष्ट्रीय गुणवत्ता मानक के रूप में प्रयोग की जाने वाली इस प्रजाति का विकास हरियाणा कृषि विश्व विद्यालय के कौल केन्द्र द्वारा वर्ष 1995 में किया गया।
  • औसतन 135-140 से0 मी0 ऊंचाई वाली यह प्रजाति लगभग 140-145 दिनों में पक जाती है।
  • इसकी औसत उपज 30-35 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।
01
Jul

टाईप-3 (देहरादून बासमती)

टाईप-3 (देहरादून बासमती) :

  • वर्ष 1935 में चयन द्वारा विकसित लम्बें, पतले एंव सुगन्धित दानों के कारण आज भी प्रदेश के विभिन्न भागों में उगाई जा रही है।
  • इसके पौधों की औसतन ऊंचाई 145-150 से0 मी0 होती है।
  • यह लगभग 140-145 दिनों में पक जाती है।
  • इसकी औसत उपज 25-30 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।

बासमती 370 :

  • अपनें बेहतर स्वाद एवं ख्शुाबू के लिए प्रसिद्व, वर्ष 1933 में नगीना केंन्द्र द्वारा विकसित यह प्रजाति आज भी अपना एक मुकाम बनाये है।
  • पकने के बाद इसके दानों की लम्बाई में लगभग दो गुनी वृद्वि हो जाती है।
  • इसके पौधों की ऊंचाई 150 से0 मी0 होती है।
  • यह 145 से 150 दिन में पक जाती है।
  • इसकी औसत उपज 25-30 कुन्तल प्रति हेक्टेअर है।
     
01
Jul

सुवासी धान की प्रजातियाँ

सुवासी धान की प्रजातियाँ:

  • भारतीय उपमहाद्वीप में दो प्रकार के सुवासी चावल की खेती की जाती है।
  • प्रथम बासमती धान जो अपनी उच्च गुणवत्ता, विशिष्ठ सुगन्ध, सुस्वाद, दानों की अच्छी लम्बाई-चौडाई एवं पकाने के बाद भी सुन्दर आकृति के कारण विश्व में एक अलग पहंचान रखता है।
  • दुसरी तरफ दानों की कम लम्बाई के बावजूद अपनी महक एवं स्वाद से मन मोहने वाली विभिन्न आंचलो में आज भी लोकप्रिय ”सुवासी छोटे दानों “ वाली प्रजातियां है।
  • उत्तर प्रदेश मे बासमती की पारम्परिक एवं नवविकसित प्रजातियों के अन्तर्गत 5-84 लाख हे0 क्षेत्रफल है जिसमे नवविकसित पूसा बासमती-1121 सर्वाधिक क्षेत्र पर उगाई जा रही है इसके बाद पूसा बासमती-1 पैदा की जा रही है।
  • बासमती से मिलती जुलती प्रजाती शरवती भी काफी क्षेत्र मे ली जा रही है।
  • पारम्परिक बासमती प्रजातियों मे टाइप-3 जो देहरादून बासमती के नाम

उत्तर प्रदेश में बासमती/सुगन्धित चावल उत्पादन परिदृश्य

  • उ.प्र. के 72 जनपदों में से 36 जनपदों- बिजनौर, सहारनपुर, रामपुर, बरेली, मुरादाबाद, पीलीभीत, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलन्दशहर, गौतमबुद्ध नगर, बागपत, बदायूं, सहाजपुर, मथुरा, अलीगढ़, हाथरस, जेपी नगर, आगरा, एटा, फिरोजाबाद, इटावा, औरैया, मैनपुरी, फरूक्खाबाद, कन्नौज, कानपुर, रमाबाई नगर, उन्नाव, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, महामाया नगर, एंव लखीमपुर खीरी में बासमती चावल की परम्परागत, नवविकसित व सुगन्धित प्रजातियों का उत्पादन उनकी भौगोलिक, मृदा, कृषि व मौसमी परिस्थितियों के अनुसार होता है।
  • उ.प्र को 02 क्षेत्रों (1- बासमती क्षेत्र तथा 2- गैर बासमती क्षेत्र) में विभाजित किया जा सकता है।
  • गैर बासमती क्षेत्र वह है जिसमें मृदा व मौसमी घटक जैसे तापमान, बरसात, टोपोग्राफी,मिट्‌टी व जल संचयन की दशा बासमती चावल के उत्पादन के अन
01
Jul

बासमती/सुगन्धित चावल परिचय

बासमती/सुगन्धित चावल परिचय

अपनी अद्भुत गुणवत्ता के लिए प्रश्सांनीय बासमती/सुगन्धित चावल भारत उपमहाद्वीप के लिए प्रकृति का एक मनोआनन्दित उपहार है। यह चावल अपने दानों की आकृति, लम्बाई, चौडाई, सुस्वाद, सुपाच्यता एंव पकने के बाद इनके दानों की लम्बाई में लगभग दो गुनी वृद्धि के कारण स्थानीय एंव अर्न्तराष्ट्रीय बाजार में उच्च मूल्य पर बेंचे जाते है। भारतीय उपमहाद्वीप में सुवासी चावल को दो समूहों में बांटा गया है।

प्रथम समूह ”बासमती चावल“ जो सुगन्धित एंव बड़े दाने वाले चावल की प्रजातियों का समूह है। इसके दानों की लम्बाई 6-61 मिमी0 से अधिक है, दानों की चौडाई 2 मिमी0 से कम, लम्बाई-चौडाई का अनुपात 3-5 से ज्यादा एंव पकाने के बाद दानों की लम्बाई में 1-7 गुना से अधिक वृद्धि होना आवश्यक है तथा औसत लम्बाई 12 मी0 से अधिक होना चाहिए, साथ ही औसत आयतन प्रसार 3-5 से अधिक हो। हिन्दी भ

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