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Crop Protection

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सप्टेंबर

शीथ ब्लाइट के पूर्व प्रवृत्त कारक

1. आपेक्षिक आर्द्रता तथा तापमान शीथ ब्लाइट संक्रमण के लिए अहम कारक होते हैं।  

2. फ़सल की छत्ती पर पर आर्द्रता 96% के करीब होती है तब रोगाणु फलता-फूलता है। 

3. 100% आपेक्षिक आर्द्रता पर उच्च संक्रमण उत्पन्न होता है तथा आर्द्रता के घटने पर धीरे-धीरे कम हो जाता है। 

4. उच्च तापमान 28-32 डिग्री से. तथा बार-बार होने वाली बरसात से रोग का विकास अधिक होता है। 

5. यह रोग सूखे मौसम की तुलना में बरसात के मौसम में अधिक होता है।   

 

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DRR मैनुअल
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शीथ ब्लाइट द्वारा प्रभावित होने वाले पौधे के हिस्से

 1. रोगाणु से रोग का विकास धान के खेत में पानी के स्तर के ठीक ऊपर होता है, जहां यह पौधे के सभी हिस्सों जैसे आवरण, अंतरसंधि, ऊपरी पत्तियां तथा पुष्प-गुच्छों को प्रभावित करता है।  

2. आवरणों पर शीथ ब्लाइट संक्रमण, ग्रहपथाकार/अंडाकार स्पोर का विकास करता है, जो धूसर रंग का होता है।  

3. प्रभावित शीथ की पत्ती सूख जाती है। आर्द्र मौसम में कवक के शरीर के सफेद धागे पत्ती के आवरणों की सतह पर देखे जा सकते हैं। 

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
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CRRI
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शीथ ब्लाइट का सामान्य रोगाणु

• शीथ ब्लाइट रोग थानेटोफोरस कुकुमेरिस एनामॉर्फ [Thanetophorus cucumeris anamorph (Rhizoctonia solani)] कवक द्वारा उत्पन्न होता है।

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
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शीथ ब्लाइट के लक्षण

 शीथ ब्लाइट रोग के लक्षण

1. शीथ ब्लाइट रोग प्रायः पौधे के बाद वाले वृद्धि चरणों में दिखाई पड़ते हैं। 

2. आरंभिक लक्षण प्रायः जल स्तर के पास की निचली पत्ती के आवरण पर जख्म के रूप में उत्पन्न होते हैं, या ये आरंभिक अंतरसंधि दीर्घीकरण अवस्था (जल जमाव के लगभग 10 से 15 दिनों के बाद) में भी उत्पन्न होते हैं। 

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एपिडेमियोलॉजी ऑफ राइस डिजीजेस (डॉ. कृष्णवेणी)
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एपिडेमियोलॉजी ऑफ राइस डिजीजेस (डॉ. कृष्णवेणी)
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शीथ ब्लाइट का आर्थिक महत्व

 1. राइस शीथ ब्लाइट गहन उत्पादन प्रणालियों में चावल के उत्पादन के लिए एक बढ़ती चिंता है।  

2. जापान में इस रोग के कारण 20% तक फ़सल नुकसान हुआ तथा 120,000-190,000 हेक्ट्येर भूमि प्रभावित हुई थी। 

3. यदि फ्लैग पत्तियां संक्रमित होती हैं तो इस स्थिति में उपज में 25% की हानि देखी जाती है।  

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http://www.knowledgebank.irri.org/ricedoctor/in dex.php?option=com_content &view=article&I d=565&Itemid=2770
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CRRI
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शीथ ब्लाइट का वितरण तथा मौजूदगी

 निम्नलिखित राज्यों में शीथ ब्लाइट रोग मध्यम से तीव्र असर के साथ उत्पन्न होता है: 

• आंध्र प्रदेश

• केरल 

• उड़ीसा तथा 

 

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल
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शीथ ब्लाइट Thanatephorus cucumeris का एक परिचय

 1.Rhizoctonia solani Kühn द्वारा उत्पन्न शीथ ब्लाइट                    

की घटना भारत में वर्तमान में उपजाई जाने वाली चावल की कई उन्नत नस्लों में व्यापक रूप से पाई जाती है।  

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(DRR ट्रेनिंग मनुअल डॉ. कृष्णवेणी)
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CRRI
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का रासायनिक नियंत्रण

 बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का रासायनिक नियंत्रण : 

1. 50% कॉपर ऑक्सीक्लोराइड वाले कॉपर फंजिसाइड्स काफी प्रभावी पाया गया है।  

2. ऐग्रीमाइसिन-100 को भी इस ब्लाइट के खिलाफ काफी असरदार पाया गया है। 

3. कृत्रिक जैविक बैक्टीरिसाइड्स जैसे कि निकल डाइमिथाइल डाइइथियोकार्बामेट, डाइथायोनोन फेनाजाइन भी इस रोग के लिए काफी प्रभावी होते हैं। 

 

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Rice nanda book
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का जैव-वैज्ञानिक नियंत्रण

बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का जैव-वैज्ञानिक नियंत्रण:

1. बिचड़े की अवस्था में जैव-नियंत्रण कारकों को बढ़ावा देने से आरंभिक अवस्था में होने वाले संक्रमण से बचा जा सकता है, जिससे रोग के लक्षण काफी कम हो सकते हैं।

2. हालांकि जैव-नियंत्रक एजेंट की एक योजनाबद्ध खोज आवश्यक है, जिससे खेत की दशाओं में बैक्टीरियल ब्लाइट के असर को कम कर उसपर नियंत्रण पाया जा सके।

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http://www.dawn.com/2007/11/05/ebr5.htm
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के नियंत्रण की पारंपरिक पद्धतियां

 बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के नियंत्रण की पारंपरिक पद्धतियां : 

1. रोगमुक्त बीज प्राप्त करना। 

2. संतुलित फर्टिलाइजेशन करना, नाइट्रोजन का अत्यधिक इस्तेमाल कर करना तथा बूटिंग पर इसका इस्तेमाल न करना। 

3. खेत से जल का निकास किया जाता है (फ़सल की पुष्पण अवस्था को छोड़कर)। 

4. साथ में उगने वाले जंगली पोषक पौधे का विनाश। 

5. प्रभावित खेत से जल को प्रवाहित होने से रोकें।    

 

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डॉ. कृष्णवेणी: चावल के रोग (PPT)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के प्रति प्रतिरोधी किस्में

 1.   व्यावसायिक रूप से उपजाई जाने वाली चावल की कुछ किस्में हैं:

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का प्रबंधन विकल्प

• प्रबंधन के विकल्पों में पारंपरिक, रसायनिक

तथा जैव-वैज्ञानिक नियंत्रण शामिल हैं।

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का वैकल्पिक पोषक

1. बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के वैकल्पिक पोषक हैं – धान के खेतों में उगने वाले आम खास-पतवार जैसे Echinochloa colona तथा Brachiaria mutica.

2. रोगग्रस्त ये खास-पतवार प्रतिकूल मौसम में इनोक्युलम को सुरक्षा देते हैं।

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के पहले से प्रवृत्त कारक

 1. बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के पहले से प्रवृत्त कारक हैं:अत्यधिक वर्धी वृद्धि से पौधे शीथ ब्लाइट के रोगाणु के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।  

2. रोग का विकास तथा उसकी तीव्रता पोषक पौधे की आयु बढ़ने के साथ बढ़ती है। 

3. चावल की अधिकतर किस्मों में पुष्पण अवस्था में इस रोग का ऊर्ध्वाधर तथा क्षैतिज विकास उच्चतम था।   

4. व्यापक रूप से 24.4-320 के रेंज वाले  माध्य न्यूनतम तथा माध्य अधिकतम तापमान और उच्च आपेक्षिक आर्द्रता व रुक-रुक कर होने वाली बारिश इस रोग के लक्षण की तीव्रता को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल दशा होते हैं। 

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का सामान्य रोगाणु

• बैक्टीरियल ब्लाइट Xanthomonas campestris pv. Oryzae द्वारा उत्पन्न होता है।

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के लक्षण

1. बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट एक विशेष प्रकार का संवहनी रोग है तथा इसके तीन स्पष्ट चरण होते है, यानि लीफ प्लाइट चरण, क्रेसेक चरण तथा हल्की पीली पत्ती वाला चरण।

2. इस रोग के लक्षण पत्तियों की शिख से या किनारे से उत्पन होते हैं, जो पीला, जल से भरा, जख्म के रूप में शिराओं के समांतर दिखाई पड़ते हैं, जिसमें बाद में पुआल पीली बन जाती है।

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drr ट्रेनिंग मैनुअल
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का आर्थिक महत्व

1. रोग की तीव्रता वहां अधिक होती है जहां चावल की खेती उच्च नाइट्रोजन उर्वरकों के साथ की जाती है।

2. इस रोग की वजह से होने वाली क्षति 50% से अधिक तक की होती है।

3. 60 के दशक में नाइट्रोजन के प्रति संवेदनशील, चावल की उच्च उपज वाली किस्म की शुरुआत के बाद यह रोग काफी गंभीर बन गया।

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http://www.knowledgebank.irri.org/ric edoctor/index.php?option=com_cont ent&view=article&id=553&Itemid=2758
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का वितरण तथा मौजूदगी

 1. बैक्टीरियल लीफ ब्लास्ट भारत में चावल की खेती वाले क्षेत्रों के लिए, खासकर सिंचित तथा वर्षाजल वाले निम्नभूमि पारिस्थितिक तंत्र का सर्वाधिक विनाशकारी रोग है। 

2. इस रोग की क्रेसेक अवस्था अधिक सामान्य होती है तथा प्रायः पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कभी-कभी बिहार में पाई जाती है। 

3. दूसरी है लीफ ब्लाइट अवस्था जो चावल की खेती वाले क्षेत्रों में अधिकतम जुताई तथा हेडिंग वाली अवस्था में उत्पन्न होती है। 

 

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का इतिहास

 1. वर्ष 1979 तथा 1980 में उत्तर-पश्चिमी भारत में गंभीर महामारी फैली, जिससे फ़सल की उपज काफी कम हुई। 

2. पंजाब तथा हरियाणा राज्यों में वर्ष 1979 तथा 1980 में बड़ी महामारी का हमला हुआ; गंभीर नुकसान हुआ जिसमें सारी फ़सल बरबाद हो गई(POS 1979 &1980).  

3. बाद के वर्षों में 1998 में केरल के पलक्कड जिले में यह रोग महामारी के रूप में फैला, तब यह उस क्षेत्र (1998 में प्रियदर्शिनी तथा नानामानिकम) के लिए महामारी ही बन गया। 

 

 

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का एक परिचय: Xanthomonas campestris pv. oryzae

1. Xanthomonas campestris pv. Oryzae,        

द्वारा उत्पन्न बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का

पता तब चला जब 60 के दशक के मध्य में नाइट्रोजन के प्रति संवेदनशील, चावल की उच्च उपज वाली किस्म T(N)1 की शुरुआत की गई। .

2. उच्च नाइट्रोजन प्रबंधन की स्थिति में इस किस्म की रोग के प्रति अधिक संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी खेती कम हो गई।

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चावल के समेकित रोग प्रबंधन में प्रगतियां (डॉ. कृष्णवेणी)
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