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Crop Protection

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सप्टेंबर

राइस टंग्रो डिज़ीज़ का इतिहास

1. भारत में राइस टंग्रो डिज़ीज़ सबसे पहले पश्चिम बंगाल में 1966 में देखा गया था।

2. उसके दो साल बाद इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर बिहार के क्षेत्रों में देखा गया।

File Courtesy: 
DRR मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी)
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राइस टंग्रो डिज़ीज़ (आरटीडी)

1. चावल को प्रभावित करने वाले रोगों में टंग्रो डिज़ीज़ का व्यापक महत्व है, खास कर यह भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्र के उत्तर-पूर्वी तथा पूर्वी तटीय क्षेत्र में पाया जाता है।   

2‘टंग्रो’ शब्द का अर्थ फिलीपिंस में बोली जाने वाली एक भाषा टैगलो में मंदित विकास होता है, जिसमें पत्ती का रंग फीका पड़ जाता है, जो हल्के हरे से नारंगी-पीले रंग की हो जाती है और टिलर्स की संख्या कम हो जाती है, जिससे पौधे का विकास का बाधित हो जाता है।  

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DRR मैनुअल
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DRR
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शीथ ब्राउन रॉट का सामान्य रोगाणु

• शीथ ब्राउन रॉट का सामान्य रोगाणु Pseudomonas fuscovaginae Miyajima है।

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http://www.knowledgebank.irri.org/smta/ind ex.php?option=com_content &view=article& id=279&catid=35&Itemid=84
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शीथ ब्राउन रॉट के लक्षण

शीथ ब्राउन रॉट के लक्षण: 

1. इस रोग के लक्षण बिचड़े की अवस्था में दिखाई पड़ते हैं तथा बाद में इसके कारण आवरण की सड़न तथा रंग फीका पड़ जाता है। 

2. प्रतिरोपण के बाद, संक्रमित बिचड़े  अपने पत्रावरण के निचले भाग में रंख खोकर पीले-भूरे रंग के हो जाते हैं।  

3. आगे चलकर यह रंगहीनता के कारण धूसर-भूरा से गहरे भूरे रंग का हो जाता है। अंततः पत्तियां सड़ जाती हैं तथा संक्रमित बिचड़े मृत हो जाते हैं।  

4. संक्रमित फ्लैग पत्रावरण जल से भर जाता है तथा नेक्रोटिक हो जाता है। अन्य आवरणों में जख्म में उभर आते हैं। 

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शीथ ब्राउन रॉट के लक्षण

शीथ ब्राउन रॉट के लक्षण:

1. इस रोग के लक्षण बिचड़े की अवस्था में दिखाई पड़ते हैं तथा बाद में इसके कारण आवरण की सड़न तथा रंग फीका पड़ जाता है।

2. प्रतिरोपण के बाद, संक्रमित बिचड़े अपने पत्रावरण के निचले भाग में रंख खोकर पीले-भूरे रंग के हो जाते हैं।

3. आगे चलकर यह रंगहीनता के कारण धूसर-भूरा से गहरे भूरे रंग का हो जाता है। अंततः पत्तियां सड़ जाती हैं तथा संक्रमित बिचड़े मृत हो जाते हैं।

4. संक्रमित फ्लैग पत्रावरण जल से भर जाता है तथा नेक्रोटिक हो जाता है। अन्य आवरणों में जख्म में उभर आते हैं।

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http://www.knowledgebank.irri.org/smta/index.ph p?option=com_content &view=article&id=279&c atid=35&Itemid=84
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शीथ ब्राउन रॉट का वितरण तथा मौजूदगी

• बैक्टीरियल शीथ ब्राउन रॉट अब व्यापक रूप से लेटिन अमेरिका, एशिया तथा मध्य अफ्रीका के बुरुंडी की उच्च भूमि में तथा मेडागास्कर में पाया जाता है।

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http://www.knowledgebank.irri.org/smta/ind ex.php?option=com_content &view=article&I d=279&catid=35&Itemid=84
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शीथ ब्राउन रॉट का परिचय

1. शीथ ब्राउन रॉट द्वारा उत्पन्न हानि के बारे में सही-सही जानकारी की कमी है, पर दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबंधीय तथा समतीशोष्ण हिस्सों में काफी नुकसान किया है।

2. शीथ ब्राउन रॉट का सामान्य रोगाणु Pseudomonas fuscovaginae है।

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http://www.knowledgebank.irri.org/smta/inde x.php?option=com_content &view=article&id =279&catid=35&Itemid=84
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शीथ ब्राउन रॉट

1. शीथ ब्राउन रॉट के लक्षण बिचड़े निर्माण के चरण में होता है तथा बाद में इसके कारण आवरण का रंग फीका पड़ जाता है और आवरण में सड़न पैदा हो जाती हूं।

2. बैक्टीरियल शीथ ब्राउन रॉट अब व्यापक रूप से लेटिन अमेरिका, एशिया तथा मध्य अफ्रीका के बुरुंडी की उच्च भूमि में तथा मेडागास्कर में पाया जाता है।

3. शीथ ब्राउन रॉट का सामान्य रोगाणु Pseudomonas fuscovaginae Miyajima है।

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पेकी राइस के सामान्य रोगाणु

कई कवक नुकसान पैदा करते हैं, जो हैं:  

• Cochliobolus miyabeanus

• Curvularia spp.

• Fusarium spp.

• Microdochium oryzae 

 

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http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_rice_diseases
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पेकी राइस के लक्षण

• हरेक पुष्प-गुच्छ में कई या सभी पुष्प झुर्रीदार हो जाते हैं तथा उनका रंग फीका होकर गहरे भूरे, बैंगनी या सफेद रंग का हो जाता है।

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पेकी राइस का वितरण तथा मौजूदगी

• पुष्प-गुच्छ में सिंगल या कई फूलों में भूरे से लाल-भूरे धब्बे उभर आते हैं; स्टिंक बग्स तथा कवक के विकास के कारण दाने का रंग फीका हो जाता है।

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पेकी राइस (कर्नल स्पॉटिंग)

पेकी राइस को कर्नल राइस भी कहते हैं

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ग्रेन रॉट का सामान्य रोगाणु

• ग्रेन रॉट Burkholderia glumae नामक रोगाणु

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ग्रेन रॉट के लक्षण

1. बैक्टीरियल ग्रेन रॉट के लक्षण बिचड़े तथा शूकियों पर दिखाई पड़ते हैं।

2. बक्से में उगाए बिचड़े भूरे होकर सड़ जाते हैं।

3. संक्रमित शूकियों के ग्लूम अपना रंग खो देते हैं।

4. तब आरंभ में गंदे धूसर रंग उभरते हैं, तब वे पीले-भूरे और अंततः गहरे भूरे होकर सिकुड़ जाते हैं और आगे चलकर ये मृत हो जाते हैं।

5. मध्यम संक्रमण में, केवल पेलीया का रंग उड़ता है। संग्रमिल कर्नल के मध्य भाग में भूरी पट्टी को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

6. संक्रमित शूकियां एक प्रभावी पुष्प-गुच्छ में असमान रूप से वितरित रहती हैं।

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http://www.knowledgebank.ir ri.org/smta/index.php?option=c om_content &view=article&id=28 0&catid=35&Itemid=84
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ग्रेन रॉट का आर्थिक महत्व

• इस रोग से होने वाली क्षति का कोई ठोस आकलन नहीं है, पर जापान के नॉर्थ क्युशू द्वीप पर इसकी हानि 900,000 हेक्टेयर तक देखी गई है।

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http://www.knowledgebank.irri.org/smta/ind ex.php?option=com_content &view=article &id=280&catid=35&Itemid=84
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बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक का रासायनिक नियंत्रण

बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक का रासायनिक नियंत्रण: 

1. कॉपर फंजीसाइड्स से इस रोग को रोकने में मदद मिलती है। 

2. कोसाइड ® (कॉपर हाइड्रॉक्साइड युक्त)  बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक के रासायनिक नियंत्रण में काफी प्रभावी माना जाता है। 

 

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http://www.agribusinessweek .com/bacterial-leaf-streak-of-rice/
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बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक का पारंपरिक पद्धतियों द्वारा नियंत्रण

बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक के पारंपरिक पद्धतियों द्वारा नियंत्रण में निम्न शामिल हैं: 

1. उर्वरकों का सही उपयोग तथा पौधों के बीच सही स्थान छोड़ना, प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग तथा गर्म जल से बीजों का उपचार आदि से इस रोग में नियंत्रण मिल सकता है। 

2. खेतों की सफाई महत्वपूर्ण होती है। रैटून्स, पुआल तथा अन्य बेकार के खास-पात को हटाना चाहिए ताकि मौसम की शुरुआत में इनोकुलम्स का विकास कम से कम हो। 

3. बीज की क्यारी में अच्छी जल निकास से भी इस रोग पर नियंत्रण पाया का सकता है। 

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http://agropedia.iitk.ac.in /?q=content /baterial-leaf-streak-bls-rice
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बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक का प्रतिरोधी किस्मों द्वारा नियंत्रण

1. BJ, TN1, Ptb 10, CR 1001, जेनिथ, TKM 6 प्रजातियां बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक के प्रति प्रतिरोधी किस्मों के रूप में जानी जाती है।

2. BJ चावल का प्रतिरोध स्वतंत्र प्रतिरोधी जीन के तीन जोड़े से निर्धारित होता है। (नायक तथा अन्य 1975).

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी
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बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक के प्रबंधन विकल्प

• बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक के नियंत्रण के विकल्पों में शामिल हैं पारंपरिक पद्धतियां, रासायनिक नियंत्रण तथा प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल।

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी
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बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक का रोग चक्र

1. प्राथमिक संक्रमण संक्रमित बीजों के जरिए होता है।

2. द्वितीयक संक्रमण वर्षा तथा सींचाई के पानी के जरिए होता है और यह स्वस्थ तथा रोगग्रस्त पौधों के संपर्क में आने से भी उत्पन्न होता है।

3. बैक्टीरिया स्टोमेटा से होकर पोषक उत्तक में प्रवेश करता तथा पैरेन्काइमैटस उत्तक में वृद्धि करते हैं।

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DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी
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