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राइस टंग्रो डिज़ीज़ के नियंत्रण की पारंपरिक विधि

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1. कृषि-विज्ञान पद्धतियों के साथ समायोजन के साथ फ़सल की आयु बढ़ने से चावल की फ़सल रोग के प्रति प्रतिरोधी बन जाती है।   

2. आम तौर पर संवेदनशील किस्म भी 75 दिनों के बाद इस रोग से प्रभावित नहीं होता। 

3. नर्सरी में नये पौध इस रोग के वाहक तथा वायरस से संक्रमित होने के लिए काफी संवेदनशील होते हैं।  

4. बुआई का समय इस तरह से समायोजित करना चाहिए कि वाहकों की अधिकतम संख्या से बचा जा सके। 

5. प्रतिरोपण के समय बिचड़े संवेदनशील होते हैं। बीज की क्यारी में बिचड़े को कीटनाशी से बचाना तथा जल्दी प्रतिरोपण करना इस रोग से बचने में कारगर साबित होता है।  

6. चावल पर आधारित फ़सलीकरण पैटर्न में ख़ासकर टंग्रो रोग पैदा होने वाले क्षेत्रों में लैग्यूम, तिलहन, रेशेदार पौधे या गांठों वाले गैर-पोषक पौधों के साथ फ़सल चक्रण से रोगों के प्रसार और अवधि में कमी आती है, और इस रोग से बचने में मदद मिलती है।  

7. रोगग्रस्त पौधे वायरस के स्रोत होते हैं। समय-समय पर प्रभावित पौधे को हटाने से इनोकुलम के स्रोत कम होते हैं तथा इस रोग के प्रसार में प्रभावशाली रूप से कमी आती है। 

 

File Courtesy: 
DRR ट्रेनिंग मैनुअल ( डॉ. कृष्णवेणी)
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