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उदबट्टा रोग

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मेघालय के नोंगपोह में यह रोग सबसे पहले देखा गया और बाद में

उत्तर-पूर्व के पहाड़ी राज्यों के जोवाई क्षेत्रों में पाया गया। इस रोग के कारण उपज 5-10% कम हो जाती है और बहुत सी स्थानेय प्रजातियां प्रभावित होती हैं। पुष्प-गुच्छ लीफ शीथ से बाहर निकलता है जो सीधा, मैले रंग लिए हुए, कड़े बेलनाकार नोक, छोटे आकार का होता है और अगरबत्ती अथवा उदबट्टा से मिलता-जुलता और इसलिए इसका नाम उदबट्टा रखा गया है। प्रभावित क्षेत्रों में दाने नहीं लगते और पुष्प-गुच्छ की 10% अनुर्वरता होती है। संक्रमित पुष्प-गुच्छ छोटे आकार का होता है।  

यह रोग Ephelis oryzae (Balansia oryzae) के कारण होता है। फूले हुए भाग की संपूर्ण लंबाई और घेरे पर फंगस स्ट्रोमा का निर्माण करता है, स्ट्रोमा में उत्तल पिक्नीडिया बनता है। पिक्निडियोस्पोरस hyaline, 4-5 सेलों वाला और सूई की आकृति का होता है।  

फंगस बीजजनित रोग होता है और अनुकरण के समय पौधों में प्रवेश कर जाता है। ऑफ-सीज़न में फंगस lsachne elegans, Cynodon dactylon और Pennisutam sp. जैसे घासों पर जीवन-यापन करता है। बहुत अगात और पिछात बुआई वाले फसलों पर इसका प्रभाव कम होता है।  

रोग के नियंत्रण के उपाय है:  

 बुआई से पहले 10 मिनट तक 50-54°C  गर्म पानी से बीजों का उपचार, 

 संक्रमित खेतों से लिए हुए बीजों के प्रयोग से बचना,  

 0.1 % Carbendazim के साथ बीजोपचार और पुष्प-गुच्छ निकलने के समय इसी फंगसनाशी से छिड़काव। 

 

File Courtesy: 
ICAR NEH, Umiam
Image Courtesy: 
CRRI
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