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'इंदिरा-9' प्रजाति के लिये पध्दकतियों का पॅकेज

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पौधशाला प्रबंधन:

पौधशाला में गीले या सूखे बेड पध्देति का अनुसरण कर के अंकुरण किया जाना चाहिये, 35-40 कि.ग्रा. बीज का प्रयोग 1000/m2 पौधशाला क्षेत्र में करना चाहिये जिस से कि एक हेक्टेायर क्षेत्र से अनुमानित अंकुरण प्राप्ते किया जा सके। बीज उपचार बाविस्टिन या थिरम @ 2- 2.5 ग्रा/कि.ग्रा. बीज पर किया जाना चाहिये। पौधशाला में 5-6 ग्रा/m2  नायट्रोजन एवं फॉस्फो्रस का प्रयोग किया जाना चाहिये। यदि पौधों में पीलापन दिखाई दे तो 15-18 दिनों के उपरांत फिर से नायट्रोजन का प्रयोग किया जाना चाहिये, अंकुरों की लंबाई के अनुसार 3-4 सें. मी. जलस्त्र बनाये रखना चाहिये। पौधशाला को खरपतवार मुक्ता रखना चाहिये। 

खेत की तैयारी: 

धान के अंकुरों के प्रत्यालरोपण के लिये, खेत को 3-4 सें.मी. खड़े पानी के साथ अच्छीि तरह से तैयार कर लेना चाहिये। लेवलर की मदद से खेत का स्त,र सही बना लिया जाना चाहिये। खेत की जुताई की तीव्रता खेत में उगे हुये खरपतवार पर निर्भर होती है। इस बात का ध्याबन रखना चाहिये कि लेवलिंग करते हुए एवं गारा बनाते समय खरपतवार अच्छीह तरह से निकल जायें। 

प्रत्‍यारोपण: 

गुणवत्ता एवं अधिक फसल लेने के लिये पौधों का प्रत्याैरोपण जुलाई के तीसरे सप्ताहह के मध्यं में किया जाना चाहिये। विलंब से किये गये प्रत्या।रोपण से जलडुबी ही नहीं अपितु अन्य  प्रजातियों में भी तुषमय अनाज का प्रादुर्भाव हो जाता है। 

अंकुरों की आयु: 

निरोग अंकुरों का रोपण करने के लिये 30-40 दिनों के अंकुरों का चयन करना चाहिये, जिससे कि गुणवत्ता एवं उत्पांद दोनों ही उच्चह प्रति के होते हैं। इससे अधिक आयु के अंकुरों का धान के अनाज पर विपरीत प्रभाव होता है। 

अंतर/फासला: 

पौधों का एक सीध में लगाना चाहिये, दो लाइनों के बीच का अंतर या फासला 20 सें.मी. रखना चाहिये जब कि पौधे से पौधे तक की दूरी 10 सें. मी. रखने की आवश्यककता होती है। हर एक टीले पर दो से तीन पौधे लगाये जाने चाहिये। इस बात का ध्या न रखा जाना चाहिये क‍ि न तो ये पौधे अधिक उथले में हों एवं न अधिक गहराई में लगे हों। पौधे को खड़ा रखने के लिये पानी की तीन से चार सें.मी.की गहराई पर्याप्तं रहेगी। 

उर्वरक अनुप्रयोग:  

धान की गुणवत्ता एवं अनाजों की उच्‍च फसल लेने के लिये अनुप्रयोग बहुत ही महलत्वछपूर्ण भाग है।  उच्च  फसल लेने के लिये  नायट्रोजन के साथ 50 कि.ग्रा. P2O5 एवं 30 कि.ग्रा. K2O/हेक्टे यर आधारीय ड्रेसिंग के स्वलरूप में बहुत ही महत्वापूर्ण भाग है। नायट्रोजन की प्रतिक्रिया  80 कि.ग्रा.नायट्रोजन/हेक्टेहयर तक प्राप्तह किया गया है। नायट्रोजन का अनुप्रयोग 30% आधारीय स्वजरूप में, 40% सक्रिय जुताई अवस्थाट में एवं 30% पुष्‍पांकुरण की आरंभिक अवस्थाआ में किया जाना चाहिये। 

जल प्रबंधन:

जल प्रबंधन धान की खेती कस बहुत ही आवश्यसक भाग है। भूमि का अधिक या कम आर्द्र होना धान की उपज पर विपरीत प्रभाव डालता है। जलप्लाववन का स्तहर प्रत्या रोपण के समय 1-2 सें.मी. होना चाहिये। वानस्‍पातिक अवस्था् में जल स्त।र 2-5 सें.मी. होना चाहिये, जब कि बाद की अवस्थाभ में 5-7 सें.मी. गहराई बनाये रखी जा सकती है। फसल की कटाई के 7-10 दिन पूर्व खेत में से पानी का निकास किया जाना आवश्‍यक है। उच्‍च मात्रा में जल दक्षता पाने के लिये 7 सें. मी. जल सिंचन करना चाहिये एवं पानी का निकास हो जाने के 3-4 दिनों के बाद पुन: सिंचाई करनी चाहिये।  इस प्रक्रिया के माध्यनम से वर्षा के पानी का प्रभावी तरीके से उपयोग किया जा सकता है। 

खरपरतवार प्रबंधन:

प्रत्‍यारोपण के 40 दिनों से पूर्व धान के खेत में खरपतवार का नियंत्रण किया जाना आवश्यनक है। खरपतवार का नियंत्रण करने के लिये 400-600 मि.ली./हेक्‍टेयर ऍनिलोफॉस या पेंडीमेथानलन 1-1.5कि.ग्रा.हेक्टे यर की मात्रा प्रत्या रोपण के 6-7 दिनों के बाद डालनी चाहिये। इन रसायनों की अनुपस्थिति में नायट्रोजन की पहली टॉप ड्रेसिंग से पूर्व खरपतवार हाथ से ही निकाल देनी चाहिये। 

कटाई:

धान कटाई एवं गहाई (भूसी निकालना) मुख्यथ धान की प्राप्तीे, छीलने का प्रतिशत एवं पिसने की गुणवत्ता निर्धारित करती है। गुणवत्ता मानक उचित प्रकार से प्राप्ता करने के लिये पुष्‍पण के 30 -35 दिनों के बाद धान की कटाई करनी चाहिये।

 

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