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'श्यामला' प्रजाति के लिये पध्दथतियों का पॅकेज

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वर्षा आधारित स्थितियों में मध्यतम भूमि के लिये इस प्रजाति की सिफारिश प्रस्ता वित की जाती है।  सत्र में वर्षा अच्छी  न होने पर भी अच्छीर उपज लेने के लिये 1 या 2 पूरक सिचाइयाँ करने पर उच्चा फसल ली जा सकती है। 

पौधशाला: सामान्‍यत: बैसी पध्दचति की सिफारिश की जाती है क्योंिकि प्रत्या रोपित क्षेत्रों में 'करगा' की समस्याय नहीं होती है। 

बीज का चयन: 17% नमक के पानी में बीजों को डुबो कर रखें एवं जो बीज नीचे बैठ जायें उनका चयन करें। 

बुवाई का समय: जुलाई की 10 तारीख से अधिक विलंब नहीं किया जाना चाहिये तथा इससे भी पूर्व बुवाई की जाये तो और भी अच्छाल रहेगा।

उर्वरक अनुप्रयोग:  80 + 50 + 30 कि.ग्रा./हेक्टेीयर या भूमि परीक्षण के अनुसार जहाँ पूरक जलसिंचाई संभव हो, मिट्टी की आर्द्रता वर्षापूरित स्थितियों के अंतर्गत 50 + 30 +20 NPK हो।

अंतर/दूरी: 20 X 15 सें.मी. एवं 15 X 15 सें.मी. विलंबित प्रत्याणरोपण स्थितियों के अंतर्गत एवं 100 कि.ग्रा. बैसी स्थितियों के अंतर्गत

रोग एवं कीट नियंत्रण:  यह प्रजाति बॅक्टिरियल बाइट के लिये सहनशील है, अन्य. कीटों के लिये सिफारिश की गई पध्दंतियों का अनुपालन किया जाना चाहिये। कीटों से बचाव के लिये 12 घंटों तक  बीज भिगोने की सिफारिश 0.02% क्लोचपिरोफोस के साथ विशेष रूप से की जाती है। 

 

 

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