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'दंतेश्वेरी' प्रजाति के लिये पध्दातियों का पॅकेज (गर्मियों की फसल के लिये)

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जुताई: खरीफ़ की फसल की कटाई के बाद 2-3 बार जुताई करना आवश्यिक है। 

पौधशाला के लिये बुवाई का समय: 15 दिसंबर से 15 जनवरी तक

बीज दर: 60-75 कि.ग्रा./हेक्टेकयर

लेही विधि : फेब्रुवारीचा प्रथम आठवडा

बीज दर : 100 कि.ग्रा./हेक्टेरयर

पौधशाला उगाने की विधि

लेही विधि: 

 बीज को 24 घंटों के लिये गुनगुने पानी के साथ बोरी में भर कर रख दिया जाता है फिर उस बीज को फैला कर एवं धान की तूडी से ढक कर 48 से 72 घंटों के लिये रखा जाता है एवं आवश्योकता के अनुसार गुनगुने पानी का छिडकाव किया जाता है।  अंकुरित बीजों को खेत में बताई गई मात्रा में आधारीय उर्वरक डालने के बाद फैला दिया जाता है।

प्रत्‍यारोपण विधि:

• अंकुरण करने के लिये एक ठेलागाड़ी भर FYM को 100 चौ.मी.खेत में पहले फैला दिया जाता है।

• खेत को अच्छी  तरह से जोत कर गारा बना लिया जाता है एवं बुवाई के लिये अंकुरित बीजों का प्रयोग किया जाता है। 

• बुवाई के बाद खेत में पर्याप्तस आर्द्रता बनाये रखनी चाहिये।

प्रत्‍यारोपण:

• उचित प्रकार से जोतने के बाद खेत में गारा भी अच्छीन तरह से बना लिया जाता है।

• उच्‍च मात्रा में फसल प्राप्त  करने के लिये मिट्टी में 10 t/ha FYM मिला लेना चाहिये।

• 40-50 दिवसीय अंकुरों का प्रत्यालरोपण 3-4 पौधों/टीलों का प्रयोग कर के 20 X 10 सें.मी.पर करना चाहिये। 

• प्रत्‍यारोपण की गहराई 3-4 सें.मी. से अधिक नहीं होनी चाहिये। 

उर्वरक:  

120 कि.ग्रा.नायट्रेजन/हेक्‍टेयर; 60 कि.ग्रा. P2O5/हेक्‍टेयर; 40 कि.ग्रा. K2O/हेक्‍टेयर

प्रयोग की विधि: 

• आधारीय मात्रा के रूप में 50% नायट्रोजन तथा फॉस्फोबरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा का प्रयोग किया जाना चाहिये।

• बचा हुआ नायट्रोजन दो समान भागों में प्रयोग में लाना चाहिये जैसे सक्रिय जुताई अवस्थार एवं पुष्पां कुरण की आरंभिक अवस्थाग।

रोग एवं कीट नियंत्रण:

यद्यपि ग्रीष्मं ऋतु में धान की खरीफ़ मौसम की तुलना में रोगों एवं कीटों का प्रादुर्भाव काफी कम होता है।  तथापि, पौधों की सुरक्षा के उपाय आवश्यीकता के आधार पर कर लिये जाने चाहिये। 

खरीफ़  धान की तरह अन्यि परंपरागत पध्दातियों का अनुपालन सिफारिश के अनुसार किये जाने चाहिये।

 

 

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