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'माहेश्वकरी' प्रजाति के लिये पध्ददतियों का पॅकेज

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खेत की तैयारी: 

दो या तीन बार जुताई एवं जड-जुताई करने के बाद मिट्टी को अच्छीे तरह से पीट कर गारा बना  लेना आवश्य क है जिस से कि खरपतवार खेत में अच्छीर तरह से मिल जायें। 

पौधशाला प्रबंधन एवं प्रत्यासरोपण: 

प्रत्‍यारोपण की स्थिति में धान की प्रजाति का परीक्षण। निम्न्लिखित मानक पध्दटतियों का अनुसरण कर के पौधशाला बनाई जानी चाहिये।  पौधशाला में बीज की योजना के बाद 35 कि.ग्रा.ha-1 की दर से एक हेक्टे यर में बुवाई करना पर्याप्त. है। FYM की एक पतली झिल्ली। से बीज ढके हुये होने चाहिये, जो प्रत्यािरोपण से पूर्व पौधशाला के उचित निष्काअसन के लिये मददगार रहेगी।  

1. उचित प्रकार से जोतने के बाद खेत में गारा भी अच्छी् तरह से बना लिया जाता है।

2. उच्‍च मात्रा में फसल प्राप्त  करने के लिये मिट्टी में 10 t/ha FYM मिला लेना चाहिये।

3.18 – 22 दिवसीय अंकुरों का प्रत्यालरोपण 1-2 पौधों का प्रयोग कर के 20 X 10 सें.मी.पर करना चाहिये। 

4. प्रत्‍यारोपण की गहराई 2-3 सें.मी. से अधिक नहीं होनी चाहिये। 

5.जुलाई के दूसरे एवं चौथे सप्ताईह के बीच में प्रत्या रोपण करना चाहिये जिस से प्रजाति से संभावित फसल प्राप्त  की जा सके।

खरपतवार प्रबंधन:

प्रत्‍यारोपण के 40 दिनों से पूर्व धान के खेत में खरपतवार का नियंत्रण किया जाना आवश्यसक है। खरपतवार का नियंत्रण करने के लिये 400-600 मि.ली./हेक्‍टेयर ऍनिलोफॉस या पेंडीमेथानलन 1-1.5 कि.ग्रा.हेक्टेेयर की मात्रा प्रत्याहरोपण के 6-7 दिनों के बाद डालनी चाहिये। इन रसायनों की अनुपस्थिति में नायट्रोजन की पहली टॉप ड्रेसिंग से पूर्व खरपतवार हाथ से ही निकाल देनी चाहिये। 

घासपात की खरपतवार के लिये फेनोक्जॅडप्रोपेथिल @60-65ग्रा./हेक्‍टेयर या सिहॅलोफॉप बटी 1 @ 80 ग्रा./हेक्‍टेयर एवं चौड़े पत्तोंी की पतवार के नियंत्रण के लिये ऍथेक्जिसॅल फ्यूरॉन @ 15  ग्रा./हेक्‍टेयर या क्लो रोम्यू रॉन एथिल+मेटरसल्‍फ्यूरॉन मेथिल@ 4 ग्रा./हेक्‍टेयर  का अनुप्रयोग बुवाई या रोपण के 15 से 20 दिनों के बाद किया जाना चाहिये।

उर्वरक:  100-120 कि.ग्रा.नायट्रोजन/हेक्‍टेयर; 60 कि.ग्रा. P2O5/हेक्‍टेयर; 40 कि.ग्रा. K2O/हेक्‍टेयर

उर्वरक प्रयोग करने का समय:

फॉस्‍फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं 50% नायट्रोजन को गाढ़ी मिट्टी में आधारीय के रूप में ड़ाला जाना चाहिये। बचा हुआ नायट्रोजन सक्रिय जुताई के समय एवं फसल की PI अवस्‍था में दो समान भागों में बाँट कर टॉप ड्रेसिंग कर देनी चाहिये। आधारीय के रूप में ड़ाला गया उर्वरक मिट्टी में अच्छी  तरह समा जाना चाहिये; वरना ड़ाला गया नायट्रोजन विविध माध्य मों से व्यरर्थ हो जायेगा। हलकी ज़मीन के नीचे 30 % नायट्रोजन का प्रयोग प्रत्याीरोपण से पूर्व एवं अच्छी् तरह से गारा बनाये हुये खेत में करना चाहिये।    40% नायट्रोजन सक्रिय जुताई के समय ड़ाला जाना चाहिये जब कि बची हुई 30% मात्रा फसल की PI  अवस्थाय में ड़ाली जा सकती है। यूरिया को नीम की टिकिया या नीम के अवक्षेपों  के साथ उपचारित करने से ड़ाले गये नायट्रोजन की दक्षता में वृध्दि होती है; इसलिये, इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग खरीफ़ के मौसम में किया जाना चाहिये। पोटाश का अनुप्रयोग 75% आधारीय एवं 25% जुताई के समय या फसल की PI अवस्थास में किया जा सकता है।

जल प्रबंधन:

रूके हुये पानी के निकास के तीन दिनों के बाद 7 सें.मी. पानी की सिंचाई या उच्च। उत्पाेद लेने के लिये 5+2 सें.मी. का निरंतर जलप्ला वन किया जा सकता है। 

पौधों की सुरक्षा:

आवश्‍यकतानुसार एवं बताये गये सुरक्षा उपायों का अनुपालन करना चाहिये। धान की खरीफ़ फसल के लिये अन्यप परंपरागत तरीकों का प्रयोग भी करना चाहिये।

 

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