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'इंदिरा बरानी धान-1' प्रजाति के लिये पध्दपतियों का पॅकेज

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खेत की तैयारी: 

दो या तीन बार जुताई एवं जड-जुताई कर के खेत की तैयारी करनी चाहिये। 

क्रमागत बुवाई: 

अच्छाु हो कि इस प्रजाति को सीधी सीध में पंक्तियों में 20 सें.मी. की दूरी रखते हुए बुवाई की जाये। बीज दर 70-80 कि.ग्रा./हेक्टे यर बनाये रखा जाना चाहिये। बीज का उपचार बाविस्टिन के साथ किया जाना चाहिये। 

• उच्‍च मात्रा में फसल प्राप्त  करने के लिये मिट्टी में 10 t/ha FYM मिला लेना चाहिये।

• प्रत्‍यारोपण की गहराई 5-6 सें.मी. से अधिक नहीं होनी चाहिये। 

• जून के तीसरे एवं चौथे सप्ता ह के बीच में प्रत्या रोपण करना चाहिये जिस से प्रजाति से संभावित फसल प्राप्तो की जा सके।

खरपतवार प्रबंधन:

आरंभिक पौध प्रतिस्प:र्धा से बचने के लिये खरपतवारनाशी का प्रयोग किया जा सकता है।  इसके लिये, 1.50 Kg a. i/ha बूटाक्‍लोर या 1.00 kg a. i/ha पेंडामेथालिन का प्रयोग (प्रत्या रोपण के 3 या 5 दिन बाद) उत्थाान-पूर्व स्थिति में गीले खेत में करना चाहिये। बुवाई के 25-30 दिनों के बाद यांत्रिक या मानवी तरीके से खरपतवार को निकाल देना चाहिये। 

Fertilizer:  

80 कि.ग्रा.नायट्रोजन/हेक्‍टेयर; 60 कि.ग्रा. P2O5/हेक्‍टेयर; 40 kg K2O/हेक्‍टेयर

उर्वरक प्रयोग करने का समय:

फॉस्‍फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं 50% नायट्रोजन को गाढ़ी मिट्टी में आधारीय के रूप में ड़ाला जाना चाहिये। बचा हुआ नायट्रोजन सक्रिय जुताई के समय एवं फसल की PI अवस्‍था में दो समान भागों में बाँट कर टॉप ड्रेसिंग कर देनी चाहिये। आधारीय के रूप में ड़ाला गया उर्वरक मिट्टी में अच्छीद तरह समा जाना चाहिये; वरना ड़ाला गया नायट्रोजन विविध माध्य्मों से व्यीर्थ हो जायेगा। हलकी ज़मीन के नीचे 30 % नायट्रोजन का प्रयोग प्रत्याारोपण से पूर्व एवं अच्छीह तरह से गारा बनाये हुये खेत में करना चाहिये। यूरिया को नीम की टिकिया या नीम के अवक्षेपों  के साथ उपचारित करने से ड़ाले गये नायट्रोजन की दक्षता में वृध्दि होती है; इसलिये, इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग खरीफ़ के मौसम में किया जाना चाहिये। 

पौधों की सुरक्षा:

आवश्‍यकतानुसार एवं बताये गये सुरक्षा उपायों का अनुपालन करना चाहिये। धान की खरीफ़ फसल के लिये अन्यए परंपरागत तरीकों का प्रयोग भी करना चाहिये। 

 

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