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जल प्रबन्धन के लिए खेतों में नहर

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1. भारत के कई भागों में खेतों में नहरें (अथवा “तीसरी श्रेणी” सिंचाई

अथवा निकास नहर) 

2. मेढ़ों में बने दरारों से होकर जल एक खेत से दूसरे खेत में बह जाते हैं। इसे ‘प्लॉट-टु-प्लॉट’ सिंचाई कहते हैं।  

3. चावल के खेत में आने वाली और निकलने वाली जल की मात्रा का नियंत्रण नहीं किया जा सकता और खेत-विशेष में जल का प्रबन्धन संभव नहीं होता।  

4. इसका अर्थ यह है कि कटाई से पहले किसान खेत से जल के निकास में सक्षम नहीं हो पाते क्योंकि दूसरे खेतों से जल का बहना जारी रहता है। 

5. साथ ही, यदि ऊंची भूमि वाले किसान अपने खेतों में जल रखना चाहें अथवा कटाई की तैयारी के लिए खेतों को सुखाएं, तो नीची भूमि वाले किसान अपने खेतों में जल का प्रवाह नहीं बना पाते। 

6. इसके अलावा,  जल के अभाव से निपटने के लिए बहुत की तकनीकों के लिए आवश्यक है प्रत्येक खेत का जल नियंत्रण बेहतर हो। अंत में, चावल के खेतों से लगातार बहने वाले जल से मिट्टी के लिए आवश्यक पोषक तत्व अथवा ऊर्वरक बह जाते हैं। 

 

 

 

 

 

 

File Courtesy: 
hhttp://www.guyanachronicleonline.com/site/index.php?option=com_content&view=article&id=9045:coping-with-water-scarcity-in-rice-production
Image Courtesy: 
IRRI
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