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टिकाऊ चावल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रबंधन रणनीति

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कुछ ऐसे अहम प्रबंधन कौशल, जो मृदा स्वास्थ्य को टिकाऊ बनाते हैं, निम्नांकित हैं:   

1. स्थान विशेष के आधार पर संतुलित रूप से उर्वरक का प्रयोग करना, ताकि नाइट्रोजन उर्वरक के विपरीत प्रभावों से बचा जा सके।  

2. मांग के आधार पर अजैविक/जैविक पोषण प्रबंधन को व्यवहार में लाना, जिनमें मौसम से पहले तथा उसके बाद हरे लेग्यूम/हरे खाद का उपयोग करना। 

3. चावल-चावल की बजाए चावल-गैर-चावल फ़सल का उपयोग करना, ताकि सही वातन हो सके और मृदा फेनॉल से भरपूर जैविक पदार्थ का अनावश्यक निर्माण से बचा जा सके। 

4. चावल के साथ फ़सल चक्रण के लिए लेग्यूम पौधों का उपयोग करना, जो न केवल मिट्टी को समृद्ध बनाते हैं, बल्कि मोनोकल्चर/अनाज-अनाज चक्रण के साथ होने वाले ऐलेलोपैथी से बचाव करता है। 

5. पोषण हानि, लवणता तथा जल जमाव की समस्या को कम करने के लिए उचित जल प्रबंधन करना। 

6. मृदा के जैविक प्रदार्थों की तीव्र ऑक्सीकरण को रोकने तथा मृदा अपरदण/मृदा संरचना में गिरावट को रोकने के लिए संरक्षणपूर्ण जुताई करना।

7. जिप्सम/चूने के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता जैसे, सॉडिसिटी/अम्लीयता में सुधार लाना तथा मृदा संरक्षण विधियों को व्यवहार में लाकर खासकर उच्च भूमियों में मृदा अपरदन को कम से कम करना।  

8. जहां उपचारात्मक कदम महंगे हों वहां विपरीत मृदा स्थितियों में उगने वाली प्रजातियों का व्यवहार करना।

9. अधिक सस्ते जैविक/फाइटोरेमेडिएशन विधियों का प्रयोग करना, ताकि जेनोबायोटिक यौगिकों तथा सूक्ष्म-जीवों/पौधों के प्रयोग द्वारा मृदा/जल के भारी धातुई संदूषण से बचा जा सके।  

10. पीड़क/रोगों से उपज की हानि को कम करने तथा मृदा प्रदूषण/जैविक निम्नीकरण को रोकने के लिए IPM पद्धतियों का इस्तेमाल करना। 

 

 

File Courtesy: 
DRR टेक्निकल बुलेटिन नं. 11, 2004-2005, एम. नारायण रेड्डी, आर. महेन्दर कुमार तथा बी. मिश्रा, चावल आधारित फ़सल प्रणाली हेतु स्थल-विशिष्ट समेकित पोषण प्रबंधन
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