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उ.प्र एंव उत्तराखण्ड में बासमती एंव सुगन्धित धान की प्रजातियों की गुणवत्ता एंव उपज वृद्धि में सहयक प्रभावी बिन्दू:

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उ.प्र एंव उत्तराखण्ड में बासमती एंव सुगन्धित धान की प्रजातियों की गुणवत्ता एंव उपज वृद्धि में सहयक प्रभावी बिन्दू:

चन्द्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, एवं सोसायटी फॉर मैनेजमेंट आफ एग्र्री-रूरल प्रोजेक्ट्‌स, कानपुर द्वारा गत 08 वर्ष से बासमती एंव सुगन्धित धान पर अध्ययत किया जा रहा है। उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकला गया है कि धान उत्पादकों को अच्छी गुणवत्ता की उपज प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तथ्यों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है:-

  • जिस भूमि में पानी खडा करने की क्षमता अधिक हो वह भूमि धान की खेती के लिए उत्तम होती है। इसके लिए 6-8-5 पी0एच0 मानक वाली मृदा अच्छी होती है।
  • धान की अच्छी उपज के लिए उच्च तापमान, नमी, लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी एंव पानी की प्रचुर उपलब्धता होनी चाहिए।
  • धान की फसल के लिए 30-37 डिग्री तापमान अच्छा रहता है। बासमती धान में सुगन्ध एंव गुणवत्ता के लिए दाने पकने के समय कम तापमान होना चहिए।
  • बसमती धान के लिए गेहू-हरी खाद/मूंग का फसल चक्र अधिक लाभदायक है। शरबती धान के बाद मटर/सूरजमुखी का भी फसल चक्र कृषकों द्वारा अपनलाया जा रहा है।
  • बासमती/सुगन्धित धान के लिए 20-25 किग्रा0 बीज प्रति हेक्टेअर की दर से तैयार की गयी पौध 01हे0 में रोपाई के लिए पर्याप्त होती है।
  • जनपद की जलवायु, भौतिक दशा, सिंचाई सुविधाओं को ध्यान में रखकर प्रजातियों का चयन करना चाहिए।     
  • बासमती की अर्द्ध बौनी प्रजातियों का पौधशला में बुवाई का उपयुक्त समय मई के अन्तिम सप्ताह से लेकर जून के तृतीय सप्ताह तक होता है।
  • गेहू की कटाई के बाद 8-10 मी0 टन प्रति हे0 गोबर की खाद/कम्पोस्ट डालकर खेत में मिलाये। यदि खाद उपलब्ध न हो तो उसमें सनई/ढ़ैंचा/मूंग हरी खाद के लिए बोयें।
  • उर्वरक का प्रयोग हमेशा संतुलित मात्रा में उपयुक्त समय में करना चाहिए। पारम्परिक बासमती की प्रजातियों (टाईप-3, तरावरी,बासमती-370 इत्यादि) में 60-40-40 उर्वरक की आवश्यकता होती है और इसके विपरीत बासमती की अन्य एंव सुगन्धित प्रजातियों के लिए 100-40-40 उर्वरक की आवश्यकता होती है। शरबती धान में भी परम्परागत बासमती की भांति कम उर्वरक की आवश्यकता होती है। 20 से 25 किग्रा0/हे0 जिंक सल्फेट कर प्रयोग करने से  पैदावार मे वृद्धि होती है। 
  • परम्परागत बासमती धान की उर्वरक मांग कम होने के कारण उत्तराखण्ड प्रशासन ने इसकी कार्बनिक खेती  नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार तथा देहरादून में आरम्भ की है।
  • 11- पी.बी-1 तथा पी0-1121, सुगन्धा की रोपाई जुलाई के प्रथम सप्ताह मे कर देनी चाहिए तथा परम्परागत   बासमती की प्रजातियों की रोपाई जुलाई के अंतिम सप्ताह तक अवश्य कर लेनी चाहिए। उथली रोपाई करने से किल्लो की संख्या मे वृद्धि होती है।
  • धान की रोपाई, ब्यात, बाली निकलते समय तथा दाना भरते समय 5-6 सेमी0 पानी खेत में रहना चाहिए
  • कटाई के 15 दिन पहले खेत से पानी निकाल कर सिंचाई बंद कर देनी चाहिए।
  • खरपतवार निकालने हेतु खरपतवारनासी ब्यूटाक्लोर 50 प्रति ई0सी0 की 03 ली0 मात्रा या ऐनीलोफास 50ई0सी0 की 400 ग्रा0 या पायेराजोसल्फयूरान 10 डब्लू पी की 5 ग्राम मात्रा  01 हे0 क्षेत्र के लिए र्प्याप्त होती है।
  • धान में दीमक, जड़ की सूडी, तनाछेदक, पत्तीलपेटक, टिड्‌डे, हिस्पा इत्यादि  अनेक कीटो का प्रकोप होता है। रासायनिक उपचार क्षतिस्तर मूल्यांकन के पश्चात करना चाहिए।इनके उपचार के लिए कार्बोफ्यूरान या कार्टेप के सक्रीय तत्व की 750 ग्राम मात्रा या फोरेट के सक्रीय तत्व की 1250 ग्राम मात्रा दाने दार उत्पाद का प्रति हेक्टेअर छिडकाव कर नियत्रित किया जा सकता है।
  • बासमती/सुगन्धित धान की फसल में सीथ ब्लाइट, जीवाणु पत्ती झुलसा, झोका, नेकब्लास्ट, लीफ स्ट्रिच, स्टेम रोठ तैसे अनेक रोगों का प्रकोप होता है। अधिक गुणवत्ता की उपज प्राप्त करने हेतु बीमारियों का प्रबंधन अति आवश्यक है।
  • फसल की कटाई हाथ से ही करें क्योंकी कम्बाईन मशीन से कटाई में लम्बे दाने वाली किस्मों में पूर्ण सफलता नही मिली है, इसमें चावल टूटने लगता है। कटाई के उपरान्त फसल को 2-3 दिन नक सूखने दें इसके बाद उसकी मडाई करें। कटाई के समय अनाज की नमी की मात्रा 15-20 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए तथा भण्डारण के समय नमी 12-13 प्रतिशत से अधिक नही होनी चाहिए।

 

File Courtesy: 
C S Azad University of Agriculture and Technology, Kanpur
Image Courtesy: 
C S Azad University of Agriculture and Technology, Kanpur
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