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धान के खरपतवारों का नियंत्रण

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धान के खरपतवारों का नियंत्रण:

  • धान की उपज खरपतवारों के प्रतिकूल प्रभाव को समाप्त करना अथवा कम से कम करना ही खरपतवार नियंत्रण क्रिया का मुख्य उद्देश्य है अर्थात ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना जिसमें खरपतवारों की बढ़वार न हो सके और ये जीवन-यापन साधनों के लिए धान की फसल से प्रतिस्पर्धा न कर सके ।
  • कभी-कभी केवल एक विधि ही पर्याप्त होती है, परन्तु खरपतवार-विरोधी वातावरण उत्पन्न करने हेतु परिस्तियों के अनुसार एक से अधिक जैसे यांत्रिक, सस्य विधि, जैविक तथा रासायनिक आदि तकनीक का प्रयोग आवश्यक हो जाता है।
  • खरपतवारों के अंकुरण से लेकर पत्तियों के विकसित होने तक उनकी भोजन-पूर्ति भूमिगत भाग से होती है। अतः जमाव के १०-१४ दिन बाद जुताई करना नियंत्रण हेतु प्रभावकारी कदम होगा, न कि जमाव के तुरन्त बाद ।
  • ऐसी भूपरिष्करण-क्रियाओं एवं शाकनाशिओं का प्रयोग चयनात्मक आधार पर करते हैं, जो यांत्रिक, रासायनिक, पचाचयन आदि सिद्धांतो पर आधारित होती है ।
  • उदाहरणार्थ अपतृनाशी (Propanil;3',4'-dichloropropiononilide) की विषाक्ता धान के पौधों द्वारा विघटित हो जाती है, जबकि खरपतवारों में ऐसी शक्ति नहीं होती , अतः वे इस अपतृणनाशी के छिड़काव से नष्ट हो जाते हैं ।
  • इनकी मारक क्षमता पर तापमान, भूमिजल, जैविक पदार्थो की मात्रा एवं भूमि गठन आदि कारक विशेष प्रभाव डालते हैं।
  • सफल फसल उत्पादन में अपनाई गई खरपतवार नियंत्रण सस्य क्रियाओं का विशेष महत्व है । साथ ही पारिस्थितिकी दशा, किसानों के साधन तथा आर्थिक पहलू पर ध्यान देना भी आवश्यक है ।
  • कोई भी विधि अथवा विधियां अपनाई जाएं, मात्र उद्देश्य खरपतवारों की संख्या अथवा प्रभाव को सीमित करना ही है, जिससे वे स्थापित न हो सके तथा अधिक हानि न पहुचाएं अर्थात वे ऐसी सीमित संख्या में रहें, कि फसल से प्रतिस्पर्धा न कर सकें।वैसे भी कह सकते हैं कि उनको पूर्णतया नष्ट करने के बजाए, उनको सीमित संख्या में रखना ही इन क्रियाओं का लक्ष्य है और इस कार्य में किए खर्च की तुलना में उपज से पर्याप्त लाभ होना चाहिए ।
  • खरपतवार नियंत्रण हेतु कोई भी विधि अपनाई जाय, अच्छे परिणामों के लिए उसका सही समय पर प्रयोग करना अति आवश्यक है, क्योंकि ये बिना बुलाए अतिथि फसल के आरम्भिक अवस्था में ज्यादा प्रतिस्पर्धी होती हैं । अतः नियंत्रण में देरी करने से उपज तथा आर्थिक लाभ तीव्र गति से घटेगा।
File Courtesy: 
http://rkmp.iari.res.in/index.aspx
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